नवभारत संपादकीय: विधान परिषद चुनाव में विपक्ष की करारी हार, लोकतांत्रिक संतुलन पर उठे सवाल
MLC Elections: महाराष्ट्र विधान परिषद चुनाव में महायुति ने 17 में से 16 सीटें जीतकर विपक्ष को बड़ा झटका दिया। नतीजों ने विपक्ष की कमजोर रणनीति और लोकतांत्रिक संतुलन पर बहस तेज कर दी।
- Written By: अंकिता पटेल
महायुति, विधान परिषद चुनाव,(सोर्स: नवभारत डिजाइन फोटो)
Maharashtra Legislative Council Election Results: अपनी संगठनात्मक शक्ति, आर्थिक संसाधनों के अ अलावा सत्ता का भरपूर इस्तेमाल कर महायुति ने विधान परिषद चुनाव में 17 में से 16 सीट जीत कर विपक्ष को बेहद करारा झटका दिया। केवल नासिक की सीट पर निर्दलीय उम्मीदवार गोकुल गीते चुनाव जीते, जो कि नामांकन भरने तक बीजेपी में सक्रिय थे और निर्वाचित होने के बाद फिर सत्तापक्ष के खेमे में चले जाएंगे। महाराष्ट्र में विपक्ष इतना कमजोर हो गया है कि अनेक स्थानों पर चुनाव सिर्फ औपचारिक प्रतीत हुआ।
कमजोर विपक्ष और सत्ता का केंद्रीकरण लोकतंत्र के लिए चिंताजनक संकेत
सत्ता पक्ष का केंद्रीकरण और विपक्ष का इतना कमजोर हो जाना क्या लोकतंत्र के लिए घातक नहीं है? विधानपरिषद चुनाव सीधे जनता से जुड़ा नहीं होता, वह राजनीति में पिछले दरवाजे से प्रवेश माना जाता है। राजनीति में सत्ता के दलालों या पावर ब्रोकर्स की कमी नहीं है।
पार्टी निष्ठा को अलग रखकर क्रॉस वोटिंग होती है। इसके बल पर जीत हासिल की जाती है। विधान परिषद चुनाव ने दिखा दिया कि विपक्ष के पास न तो एकजुटता है और न सक्षम प्रभावी रणनीति।
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इसे देखकर शेर याद आता है- इस सादगी पे कौन ना मर जाए ऐ खुदा, लड़ते हैं मगर हाथ में तलवार भी नहीं। विधान परिषद की कुल 17 सीटों के लिए महाविकास आघाड़ी उम्मीदवार भी नहीं दे पाई।
विधान परिषद नतीजे विपक्ष के लिए बड़ी चेतावनी, बिखराव से बढ़ी चिंता
जहां प्रत्याशी दिए, वहीं कोई प्रचार से दूर रहा, कोई अस्पताल में भर्ती हो गया, तो कोई अज्ञात स्थान रवाना हो गया। नासिक में तो चुनाव मजाक बनकर रह गया। वहां महायुति के 475 वोट होने पर भी निर्दलीय गोकुल गीते चुनकर आ गए। स्थानीय स्तर पर व्यक्तिगत संबंध, सत्ता से निकटता रखने तथा नेताओं के आपसी मतभेद का लाभ गीते को मिला। गोकुल गीते के भाई गणेश बीजेपी के संकटमोचक कहलाने वाले गिरीश महाजन के गुट के हैं।
महाराष्ट्र की राजनीति ऐसी है कि कोई भी चुनाव जीते, वह आखिर सत्तापक्ष में ही जाता है। गीते को लेकर भी यही संभावना व्यक्त की जा रही है। ऐसी स्थिति में सरकार से जवाब तलब करने वाले, जनता की समस्या व भावना को रखने वाले तथा विकल्प देने वाले विपक्षी कहां से आएंगे? लोकतंत्र में विपक्ष की अपनी अहमियत है। उसके बगैर लोकतंत्र कमजोर हो जाता है।
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विधान परिषद चुनाव के नतीजे विपक्ष के लिए बहुत बड़ी चेतावनी है। वह अब भी एकजुट होकर संभलने का प्रयास करे। विपक्षी पार्टियों और उनके नेता आपस में सहयोग व समन्वय बढ़ाने का प्रयास करें। उनका बिखराव व निरुत्साह घातक सिद्ध हो रहे हैं, जिसका महायुति सीधा फायदा उठा रही है। सत्तापक्ष अत्यंत शक्तिशाली होने पर उसके निरंकुश होने की आशंका बनी रहती है। विपक्ष के लिए यह संकेत है कि वह अपना आधार खिसकने न दे।
लेख- चंद्रमोहन द्विवेदी के द्वारा
