नवभारत संपादकीय: महाराष्ट्र में मानसून संकट गहराया, खरीफ बुआई और जलसंकट ने बढ़ाई चिंता

Maharashtra Monsoon Farmers Crisis: कम बारिश और जलसंकट के कारण महाराष्ट्र में खरीफ फसलों की बुआई प्रभावित हुई है। विदर्भ व मराठवाड़ा सबसे ज्यादा प्रभावित हैं और किसान अच्छी बारिश का इंतजार कर रहे हैं।
Navbharat Editorial: Monsoon crisis deepens in Maharashtra; Kharif sowing and water scarcity raise concerns.
महाराष्ट्र, मानसून, खरीफ फसल,(सोर्स: नवभारत डिजाइन फोटो)
Updated on

Weak Monsoon Impact Maharashtra:महाराष्ट्र में कृषि पर भारी संकट मंडरा रहा है। दक्षिण पश्चिम मानसून से मुश्किल से 26 फीसदी वर्षा हुई है। अल नीनो की वजह से खरीफ फसलों की बुआई प्रभावित हुई है। मराठवाडा और विदर्भ के सूखाग्रस्त क्षेत्र विशेष रूप से प्रभावित हैं। पुणे के जलाशयों में 25 प्रतिशत से भी नीचे पानी बाकी रह गया है। हफ्ते में 3 दिन जलापूर्ति की जा रही है। जायकवाडी तथा अन्य बांधों में जलस्तर काफी घट गया है। किसान आतुरता से वर्षा की राह देख रहे हैं।

पश्चिम महाराष्ट्र व कोंकण में हल्की वर्षा हुई। इसके बाद मानसून गायब हो गया। पानी की कमी की वजह से राज्य की 1.58 करोड़ हेक्टेयर कृषिभूमि में से सिर्फ 1.44 लाख हेक्टेयर में कृषि कार्य किए जा रहे हैं। विदर्भ और मराठवाडा में जमीन में पर्याप्त नमी नहीं होने से कपास व सोयाबीन की बुआई रुकी हुई है।

कमजोर मानसून की आशंका से बुआई प्रभावित, खेती का रकबा तेजी से घटा

गत वर्ष 19,007 हेक्टेयर में धान की उपज हुई थी। इस बार धान का क्षेत्र सिर्फ 4,804 हेक्टेयर रह गया। तुअर-मूंग का भी यही हाल है। बाजरे की खेती 26,455 हेक्टेयर से कम होकर 588 हेक्टेयर में सीमित हो गई। मक्के की बुआई भी 10,216 हेक्टेयर में हुई है। भारतीय मौसम विभाग में इस वर्ष कम मानसून की संभावना जताई है जो 60 फीसदी रह सकता है। राज्य सरकार ने किसानों को भी बुआई नहीं करने को कहा है।

कमजोर मानसून, महंगे बीज-खाद और बढ़ते जलसंकट से किसान चिंतित

ऐसा करने पर बीज बेकार जाएगा और आर्थिक नुकसान होगा। कृषि संकट को देखते हुए कृषि विभाग अल्पावधि में फसल देनेवाले बीजों को बढ़ावा दे रहा है। ऐसी संकट की घड़ी में राज्य सरकार ने पेयजल को सर्वोच्च प्राथमिकता दी है। इसके बाद कृषि सिंचाई और फिर उद्योगों को पानी दिया जाएगा।

राज्य में कृषि संकट को गंभीरता से लेना होगा। तथ्य यह है कि गन्ने की सिंचाई में 60 प्रतिशत पानी लग जाता है जिसकी खेती 5 प्रतिशत से भी कम जमीन में होती है। इथेनाल बनाने के लिए गन्ने की खेती बढ़ाई जा रही है। इससे जलसंकट और भी बढ़ेगा। ऐसी स्थिति में उन फसलों को प्रोत्साहन देना होगा जिनकी कम सिंचाई में पैदावार हो सकती है।

इस बार अरब सागर से गर्म हवाएं बंगाल की खाड़ी की ओर नहीं जा रही हैं जिनसे वर्षा होती है। मानसून केरल में हल्का सा आया फिर कोंकण पहुंचा और उसके बाद उनका जोर कम पड़ गया। अब तक मुंबई में भी मानसून की एंट्री नहीं हुई। वहां बरसने के बाद वह मराठवाडा और विदर्भ में प्रवेश करता है। दक्षिण पश्चिम मानसून कमजोर रहने से भारी चिंता व्याप्त हो गई है।

मृग नक्षत्र बिल्कुल खाली गया। अब 22 जून से आद्रा नक्षत्र शुरू होगा। एक ओर बारिश नहीं हो रही है, दूसरी ओर बीज और खाद महंगे हो गए हैं। गत वर्ष 1,400 रुपए में मिलनेवाला रासायनिक खाद का बैग अब 2,150 रुपए में बेचा जा रहा है। सोयाबीन बीज का बैग गत वर्ष 2,800 रुपए का था जो अब 3,400 में मिल रहा है। बारिश कम हुई तो खेती को भारी नुकसान होगा।

लेख- चंद्रमोहन द्विवेदी के द्वारा

Navbharat Live
navbharatlive.com