महाकुंभ मेला (डिजाइन फोटो)
नवभारत डेस्क: पड़ोसी ने हमसे कहा, ‘‘निशानेबाज, हर 12 वर्ष में एक बार होनेवाला महाकुंभ मेला पूर्णिमा और संक्रांति के स्नान के साथ प्रारंभ हो गया। लाखों लोगों ने प्रयागराज के त्रिवेणी संगम पर आस्था की डुबकी लगाई। कितने ही लोग वहां कल्पवास करेंगे और संत-महात्माओं के प्रवचन सुनेंगे और भजन करेंगे। कुंभ में जाकर दिव्य अनुभूति होती है। अब वहां शाही स्नान नहीं, बल्कि अमृत स्नान होता है।’’
हमने कहा, ‘‘वहां भव्य तैयारियां और सारी सुविधाएं उपलब्ध हैं। जब ऐसा इंतजाम नहीं था, तब भी कुंभ मेले में अपार जनसमुदाय उमड़ पड़ता था। 1954 में तत्कालीन राष्ट्रपति डा. राजेंद्र प्रसाद, प्रधानमंत्री नेहरू, यूपी के मुख्यमंत्री गोविंदवल्लभ पंत, मध्यप्रदेश के सीएम रविशंकर शुक्ल कुंभ स्नान करने प्रयाग पहुंचे थे। तब वहां भगदड़ मची थी जिसमें 800 से ज्यादा लोगों की कुचलने से मृत्यु हुई थी।’’
पड़ोसी ने कहा, ‘‘निशानेबाज, जहां वीआईपी पहुंचे वहां भीड़ को संभालने की बजाय उनकी देखरेख में प्रशासन और पुलिस लग जाते हैं। इस बार व्यवस्था चाकचौबंद है इसलिए चिंता करने की जरूरत नहीं है।’’
पड़ोसी ने कहा, ‘‘निशानेबाज, जब समुद्र मंथन के दौरान अमृत निकला तो उसे पाने के लिए देव-दानवों में होड़ लग गई। इस बीच गरुड़ अमृत कलश को लेकर उड़ गए। अमृत की बूंदें छलक कर जहां गिरीं वहां कुंभ मेला होने लगा। प्रयागराज, हरिद्वार, उज्जैन और नाशिक में बारी-बारी से कुंभ होता है। ब्रिटिश गवर्नर जनरल लार्ड लिनलिथगो को बहुत आश्चर्य हुआ था कि कुंभ का आयोजन कौन करता है और देश के कोने-कोने से लाखों लोग इस समय कैसे आ पहुंचते हैं। उन्हें पं। मदनमोहन मालवीय ने बताया कि यह 2 पैसे के पंचांग का कमाल है। उसे देखकर सभी चले आते हैं।’’
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हमने कहा, ‘‘कुंभ का अर्थ है घट या घड़ा। अगस्त्य मुनि का जन्म कुंभ में हुआ था इसलिए उन्हें कुंभज भी कहा जाता है। कहते हैं कि कुंभ में देवता भी उपस्थित रहते हैं। यदि आप कुंभ मेले में जा सकें तो अच्छी बात है नहीं तो घर में ही श्रद्धा भाव से हर-हर गंगे भागीरथी कहकर स्नान कर लीजिए क्योंकि मन चंगा तो कठौती में गंगा!’’
लेख- चंद्रमोहन द्विवेदी के द्वारा