चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ ने देखी लापता लेडीज, किसी फिल्म में होती खासियत और तमीज
सुप्रीम कोर्ट की 75वीं वर्षगांठ पर चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ सहित अन्य जजों ने किरण राव की फिल्म 'लापता लेडीज' देखी और उसे पसंद किया। फिल्म की तारीफ करते हुए सीजेआई चंद्रचूड़ ने कहा कि इसमें स्त्री-पुरुष समानता दिखाई गई जो मेरे दिल के बहुत करीब है। इसमें भारत की बहुस्तरीय जिंदगी प्रदर्शित की गई है।
- Written By: किर्तेश ढोबले
चीफ जस्टिस चंद्रचूड़ ने देखी लापता लेडीज (डिजाइन फोटो)
पड़ोसी ने हमसे कहा, “निशानेबाज, सुप्रीम कोर्ट की 75वीं वर्षगांठ पर चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ सहित अन्य जजों ने किरण राव की फिल्म ‘लापता लेडीज’ देखी और उसे पसंद किया।”
हमने कहा, “अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव में ज्यूरी और सुप्रीम कोर्ट के आडिटोरियम में जज किसी फिल्म का विशेष प्रदर्शन देखते हैं तो मान कर चलिए कि फिल्म सिर्फ मनोरंजन तक सीमित नहीं होगी, उसमें कोई ज्वलंत और संवेदनशील मुद्दा प्रभावी तरीके से उठाया गया होगा। महान नेता भी चुनिंदा फिल्म देखते रहे हैं। मिसाल के तौर पर प्रथम प्रधानमंत्री पं. नेहरू ने बिमल राय निर्मित फिल्म ‘बिराज बहू’ देखी थी जिसमें कामिनी कौशल ने केंद्रीय भूमिका की थी। यह वही कामिनी कौशल हैं जो फिल्म ‘चेन्नई एक्सप्रेस’ में शाहरूख खान की दादी बनी थीं और फिलहाल 98 वर्ष की हैं। नेहरू ने फिल्म मिर्जा गालिब भी देखी थी और उसकी हीरोइन सुरैया के अभिनय की तारीफ करते हुए कहा था- लड़की तुम बहुत अच्छा काम करती हो। फिलहाल फिल्म ‘लापता लेडीज’ की तारीफ करते हुए सीजेआई चंद्रचूड़ ने कहा कि इसमें स्त्री-पुरुष समानता दिखाई गई जो मेरे दिल के बहुत करीब है। इसमें भारत की बहुस्तरीय जिंदगी प्रदर्शित की गई है। जब दूसरी बार आप इस फिल्म को देखते हैं तो उसे और बेहतर समझते हैं।”
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पड़ोसी ने कहा, “निशानेबाज, इस फिल्म में हिंदी भाषी राज्यों के ग्रामीण क्षेत्रों में प्रचलित घूंघट प्रथा का दुष्परिणाम दिखाया गया है जिसमें स्टेशन पर शादी से लौटी 2 बारातों के बीच दुल्हनें अदल-बदल जाती हैं। वैसे लगभग 60 वर्ष पूर्व जैमिनी पिक्चर्स की फिल्म ‘घूंघट’ में भी यही मुद्दा उठाया गया था। उस फिल्म में बीना राय, आशा पारेख, भारत भूषण और प्रदीप कुमार की भूमिका थी। उस फिल्म की तुलना में ‘लापता लेडीज’ और कई कदम आगे जाती है। इसके संवादों की गहराई पर गौर कीजिए। स्टेशन पर चाय बेचनेवाली कहती है- ‘ई देश में लड़की लोगोन के साथ हजारों सालों से एक फ्राड चल रहा है। ऊका नाम है- भले घर की बहू है!’ जिस महिला ने अपने घर में उच्च शिक्षा पाने की उत्सुक जया को आश्रय दे रखा है वह कहती है- घर की औरतें सास, ननद, देवरानी, जेठानी सभी बन जाती हैं, एक- दूसरे की सहेली नहीं बन पातीं।”
लेख चंद्रमोहन द्विवेदी द्वारा
