नवभारत संपादकीय: जस्टिस भुइयां बोले- सवाल पूछना देशद्रोह नहीं, असहमति पर कार्रवाई असंवैधानिक

Supreme Court Student Rights: जस्टिस उज्ज्वल भुइयां ने कहा कि सवाल पूछने, असहमति जताने या अलग दृष्टिकोण रखने पर छात्रों के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई नहीं हो सकती। सरकार से सवाल करना देशद्रोह नहीं है।
Students Right to Dissent
जस्टिस उज्ज्वल भुइयांफोटो सोर्स- नवभारत डिजाइन
Published on
Updated on

Students Right to Dissent: सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस उज्ज्वल भुइयां ने सु कहा कि छात्रों के खिलाफ केवल इस आधार पर दंडात्मक कार्रवाई नहीं की जा सकती कि वह सवाल पूछते हैं, असहमति व्यक्त करते हैं या अलग दृष्टिकोण रखते हैं। सरकार से सवाल करना देशद्रोह नहीं है।

संविधान मानता है कि एक स्वतंत्र समाज में अलग-अलग विचार और मान्यताएं होती हैं। नेशनल लॉ युनिवर्सिटी दिल्ली के दीक्षांत समारोह के अवसर पर जस्टिस भुइयां ने कहा कि प्रश्न करने वाले छात्रों को दंड देना असंवैधानिक और सत्ता का दुरुपयोग है। विश्वविद्यालय ऐसे होने चाहिए, जहां स्थापित धारणाओं का परीक्षण किया जा सके, चुनौती दी जा सके और उन पर तर्कतंगत बहस की जा सके।

असहमति अपराध नहीं, छात्रों के सवालों पर सजा गलत

न्यायमूर्ति के इस परामर्श को सही भावना से लेना होगा। विश्वविद्यालयों के अपने नियम होते हैं और गुंडागर्दी, हिंसा, धमकी जैसी गैरकानूनी बातों के लिए वहां कोई स्थान नहीं है। इतने पर भी असहमति, आलोचना तथा तीखे सवालों को इस श्रेणी में नहीं रखा जा सकता।

खतरा वहां उत्पन्न होता है, जहां असहमति को अवज्ञा मान लिया जाता है। यदि कोई छात्र किसी नीति या निर्णय पर सवाल उठाता है, तो इसका मतलब यह नहीं कि वह संस्था की वैधता को चुनौती दे रहा है। एक युवा छात्र का किसी प्राध्यापक, प्रशासक या सरकार से असहमत होना अपराध नहीं है।

Students Right to Dissent
न्यायमूर्ति संजीव खन्ना होंगे भारत के 51वें मुख्य न्यायाधीश, कल लेंगे पद व गोपनीयता की शपथ

सवाल करने वाले छात्रों पर कार्रवाई

वास्तव में उच्च शिक्षा का उद्देश्य ही यही है कि ऐसे नागरिक तैयार किए जाएं, जो सवाल पूछें कि ऐसा क्यों? स्वतंत्रता तभी है जब किसी का असुविधाजनक विचार या दृष्टिकोण सत्ताधारियों को उद्वेलित या बेचैन कर दे।

न्यायमूर्ति भुइयां की इस चेतावनी पर गौर किया जाना चाहिए कि कोई भी अनुदार मस्तिष्क संविधान की उदात्त भावना से मेल नहीं खाता। इन दिनों विश्वविद्यालय कैम्पस में विचारों को अनुशासन के नाम पर दबाया जा रहा है। सवाल करने या व्यवस्था को चुनौती देने वाले छात्रों को कारण बताओ नोटिस, धमकी देने, प्रतिबंध लगाने के अलावा उन पर दंडात्मक कार्रवाई की जा रही है।

विश्वविद्यालयों में सवालों की आजादी जरूरी

इस तरह युवाओं को खामोश किया जा रहा है कि वह मुंह बंद रखें और कोई असुविधाजनक सवाल न पूछें तथा प्रचलित धारणा के खिलाफ न जाएं। वास्तव में विश्वविद्यालय लोकतंत्र की प्रयोगशाला होने चाहिए।

छात्रों को अपनी पसंद-नापसंद बताने तथा तर्क करने की छूट होनी चाहिए, कक्षा में सिर्फ यह न सिखाया जाए कि क्या सोचना है बल्कि यह भी सिखाया जाए कि तर्क के आधार पर कैसे सोचना है। क्या न्यायमूर्ति भुइयां की सलाह पर विश्वविद्यालय ध्यान देंगे?

लेख- चंद्रमोहन द्विवेदी के द्वारा

Navbharat Live: Hindi News
navbharatlive.com