नवभारत विशेष: जेफ्री एपस्टीन के साथ हरदीप सिंह पुरी की तस्वीरें वायरल, क्या है पूरा मामला?

Hardeep Puri Epstein Photos: जेफ्री एपस्टीन के साथ हरदीप सिंह पुरी की तस्वीरें सामने आने के बाद उनकी मुलाकातों को लेकर सवाल उठ रहे हैं। पुरी ने इन संपर्कों को पेशेवर बताया है।
Epstein Files US Midterm Elections Controversy
डोनाल्ड ट्रम्प और जेफ़री एपस्टीनफोटो सोर्स- नवभारत डिजाइन
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Highlights

  • जेफ्री एपस्टीन से जुड़ी तस्वीरों में केंद्रीय मंत्री हरदीप सिंह पुरी के नजर आने पर विवाद।

  • पुरी ने एपस्टीन से मुलाकातों को पेशेवर बताया, अपराधों से संबंध होने से इनकार किया।

  • राहुल गांधी ने तस्वीरों और अमेरिकी विदेश मंत्री की भारत यात्रा के संदर्भ में सवाल उठाए।

  • 3 नवंबर 2026 के अमेरिकी मध्यावधि चुनावों से पहले एपस्टीन फाइल्स का मुद्दा फिर चर्चा में।

Epstein Files US Midterm Elections Controversy: अमेरिकी यौन अपराधी जेफ्री एपस्टीन की मौत को 7 साल बीत चुके हैं, लेकिन उसके संपकों, प्रभावशाली लोगों से रिश्तों और न्यायिक जांच से जुड़े दस्तावेजों का विवाद आज भी अमेरिकी राजनीति को परेशान कर रहा है। अब भारत के पेट्रोलियम मंत्री हरदीप सिंह पुरी के साथ उसकी तस्वीरें वायरल होने और नवंबर में होने वाले अमेरिकी कांग्रेस के मध्यावधि चुनावों से पहले यह सवाल प्रासंगिक हो गया है। क्या एपस्टीन फाइल्स का प्रेत फिर सिर उठा रहा है? 22 अक्टूबर को प्रकाशित रिपोर्टों के मुताबिक, अमेरिकी न्याय विभाग की ओर से पहले जारी किए गए एपस्टीन दस्तावेजों में हरदीप सिंह पुरी और एपस्टीन की तस्वीरें सामने आई हैं।

द वायर की रिपोर्ट के मुताबिक, संबंधित डाटासेट में एक ही बैठक के अलग-अलग कोणों से ली गई कई तस्वीरें हैं। तस्वीरों में दोनों एक मेज के आमने-सामने बैठे दिखाई दे रहे हैं। फरवरी 2026 में पुरी ने स्वीकार किया था कि अंतरराष्ट्रीय शांति संस्थान (आईपीआई) से जुड़े अपने कार्यकाल के दौरान उनकी एपस्टीन से 3-4 बार मुलाकात हुई थी। लेकिन उनका कहना था कि ये संपर्क पेशेवर गतिविधियों के संदर्भ में थे और उनका एपस्टीन के अपराधों से कोई संबंध नहीं था।

एपस्टीन प्रकरण पर पारदर्शिता जरूरी

किसी सार्वजनिक पद पर बैठे व्यक्ति के लिए केवल यह कहना पर्याप्त नहीं हो सकता कि मुलाकात पेशेवर थी। यदि तस्वीरों और उपलब्ध दस्तावेजों से पहले दिए गए विवरण के बारे में सवाल उठते हैं, तो मुलाकातों की तारीख, उद्देश्य, प्रतिभागियों और संवाद का स्पष्ट विवरण देना सार्वजनिक विश्वास के लिहाज से उचित होगा। यही लोकतांत्रिक जवाबदेही की कसौटी है। दूसरी ओर, विपक्ष को भी किसी तस्वीर के आधार पर अपराध का निष्कर्ष सुनाने से बचना चाहिए, राहुल गांधी ने पुरी की तस्वीरों और अमेरिकी विदेश मंत्री माकों रुबियो की भारत यात्रा के संदर्भ में अमेरिका द्वारा कथित ब्लैकमेलिंग का सवाल उठाया है।

केवल घटनाओं का समय एक-दूसरे के करीब होना किसी साजिश को सिद्ध नहीं करता। अमेरिका में एपस्टीन प्रकरण की राजनीतिक संवेदनशीलता कहीं अधिक व्यापक है। 3 नवंबर 2026 को होने वाले मध्यावधि चुनावों में प्रतिनिधि सभा और सीनेट के नियंत्रण का फैसला होना है। इस चुनाव का महत्व इसलिए भी है कि कांग्रेस का नियंत्रण बदलने पर राष्ट्रपति के शेष कार्यकाल में जांच, विधायी एजेंडे और प्रशासनिक निगरानी की दिशा प्रभावित हो सकती है।

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एपस्टीन प्रकरण बना अमेरिकी चुनावी मुद्दा

रिपब्लिकन फिलहाल दोनों सदनों में मामूली बहुमत रखते हैं। डेमोक्रेट प्रतिनिधि सभा में बढ़त हासिल करने की उम्मीद कर रहे हैं जबकि सीनेट का परिणाम अनिश्चित है। यदि डेमोक्रेट प्रतिनिधि सभा पर नियंत्रण हासिल करते हैं, तो उन्हें जांच समितियों के माध्यम से दस्तावेज तलब करने और गवाही मांगने की अधिक शक्ति मिल सकती है। इसी पृष्ठभूमि में एपस्टीन प्रकरण चुनावी हथियार बन गया है।

सीएनएन के अनुसार, 2026 के चुनाव प्रचार में एपस्टीन से जुड़े 160 से अधिक विज्ञापन प्रसारित किए गए हैं, जिन पर 3.5 करोड़ डॉलर से अधिक खर्च हुआ। कुछ विज्ञापनों में प्रतिद्वंद्वियों के संबंधों या फाइलें जारी करने के उनके रुख को निशाना बनाया गया है। ट्रंप का नाम इस बहस में बार-बार इसलिए आता है कि एपस्टीन से उनके पुराने सामाजिक परिचय और सार्वजनिक रूप से ज्ञात संपर्कों पर लंबे समय से सवाल उठते रहे हैं। लेकिन दस्तावेजों में किसी व्यक्ति का उल्लेख होना, उसके साथ सामाजिक संपर्क होना और उसके अपराधों में संलिप्त होना अलग-अलग श्रेणियां हैं।

फिर बन गया चर्चा का मुद्दा

अक्टूबर के पहले सप्ताह में प्रकाशित गार्जियन की रिपोर्ट के अनुसार, डेमोक्रेटिक नेताओं ने चुनाव जीतने की स्थिति में एपस्टीन फाइल्स सहित कई विषयों पर कांग्रेस की जांच को प्राथमिकता देने की बात कही थी।

फिर भी जांच की घोषणा और किसी अपराध के प्रमाण मिलने में बड़ा अंतर है। यदि कांग्रेस में सत्ता का संतुलन बदलता है, तो दस्तावेजों और गवाहियों को लेकर दबाव बढ़ सकता है। यदि रिपब्लिकन अपना नियंत्रण बनाए रखते हैं, तब भी सार्वजनिक दबाव और मीडिया की जांच समाप्त हो जाएगी, इसकी गारंटी नहीं है।

लेख- नरेंद्र शर्मा के द्वारा

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