अन्वेषा मिशन (डिजाइन फोटो)
PSLV C62 Launch Failure: पीएसएलवी-सी 62 मिशन का लक्ष्य न सिर्फ भारत की रणनीतिक राष्ट्रीय जरूरतों को पूरा करना था बल्कि कमर्शियल स्पेस में वैश्विक महत्वकांक्षाएं भी थीं। जाहिर है इसकी नाकामी से इन दोनों उद्देश्यों को धक्का लगा है। पीएसएलवी लम्बे समय से इसरो का वर्कहॉर्स रहा है, जिसने अपनी विश्वसनीयता की बदौलत अच्छा व्यापार किया है। लेकिन अब वह दो बार नाकाम हो गया है, जिससे ग्राहक संकोच करने लगेंगे।
कड़ी प्रतिस्पर्धा के बाजार में, जहां नये लांचर तेज ताल का वायदा करते हैं, इसरो गुडविल की विरासत पर मुकाबला नहीं कर सकता। नवीनतम असफलता इसरो की कमर्शियल विश्वसनीयता पर बट्टा लगाती है। भारत में पहले ही आसमान से निगरानी, टोहने व सुरक्षित कम्युनिकेशन का अभाव है। रक्षा सैटेलाइट के खोने से यह फासला अतिरिक्त चौड़ा हो जाता है।
ऑपरेशन सिंदूर के बाद इसरो ने यह घोषित करने का कदम उठाया था कि दुश्मन देश के अंदर सटीक स्ट्राइक्स देश की स्पेस क्षमता की वजह से ही मुमकिन हो सकी। लेकिन हर नाकाम लांच तैनाती कार्यक्रम को महीनों, कभी कभी वर्षों, पीछे धकेल देता है। रिप्लेसमेंट सैटेलाइटस को जरूरत होती है फंडिंग मंजूरी की, पुनःनिर्माण चक्र की और नये लांच स्लॉट्स की। भारत के प्राइवेट लांच वाहन अभी भी विकास के शुरुआती चरण में हैं। निकट भविष्य के लिए, राष्ट्रीय रणनीतिक मिशन अब भी इस बात पर निर्भर हैं कि इसरो के लांच सिस्टम्स सुचारू रूप से कार्य करें।
इसरो का पीएसएलवी-सी 62 लाॅन्च के दौरान ‘अपने नियोजित उड़ान मार्ग से भटक गया’ जोकि न केवल सुरक्षा एजेंसीज के लिए बहुत बड़ा धक्का है कि महत्वपूर्ण रक्षा सैटेलाइट ईओएस-एन 1 (अन्वेषा) खो गया बल्कि अनेक भारतीय व विदेशी संस्थाओं, स्टार्टअप्स व कम्पनियों ने विघटनकारी टेक्नोलॉजी वाले 15 उपग्रह भी खोए, जिनसे स्पेस सेक्टर में क्रांतिकारी परिवर्तन आ सकता था।
डीआरडीओ की ईओएस-एन 1 (अन्वेषा), रणनीतिक सुपर आंख, हाइपरस्पेक्ट्रल इमेजिंग सैटेलाइट था, जिसमें सैकड़ों वेवलेंथ ‘देखने’ की क्षमता थी, जिससे वह राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए उच्च वरीयता का एसेट बनता। अगर वह अपनी कक्षा में पहुंच जाता तो वह अपनी एडवांस्ड रिमोट सेंसिंग क्षमता से देश की सीमाओं को सुरक्षित रखने में मदद करता और साथ ही कृषि, शहरी मैपिंग व पर्यावरण अवलोकन जैसे क्षेत्रों में नागरिकों के भी काम आता।
इसरो एक साथ गगनयान, हैवी-लिफ्ट डेवलपमेंट, गृह मिशन पर काम करने के अतिरिक्त कमर्शियल मांगों का भी विस्तार कर रही है। पीएसएलवी का संकट इंजीनियरिंग फोकस, टेस्टिंग सुविधाओं व नेतृत्व ध्यान को भटका देता है। इस दबाव का अन्य कार्यक्रमों पर असर पड़ने का खतरा बना रहेगा अगर वरीयताओं को स्पष्टता के साथ पुनः तय न किया जाये। प्रतिद्वंदी चीन स्पेस कार्यक्रम में बहुत तेजी से आगे निकलता जा रहा है।
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चीन ने हाल ही में मात्र 19 घंटों के दौरान तीन मिशन सफलतापूर्वक लांच किये। चीन ने सैटेलाइटस के बीच इन-ऑर्बिट रीफ्यूलिंग का भी प्रदर्शन किया है, जबकि इस क्षमता पर अमेरिका अभी काम ही कर रहा है। इसके विपरीत भारत एक साल में सिर्फ छह लांच ही कर सका है, जिनमें से तीन सफल रहे, एक उड़ान के दौरान नाकाम रहा, एक रास्ता भटक गया और एक ऑर्बिट में तो पहुंच गया, लेकिन स्पेसक्राफ्ट के महत्वपूर्ण वाल्व में खराबी आ गई और मिशन खंडित हो गया।
दरअसल, बुनियादी समस्या का समाधान नहीं किया जा रहा है। भारत की स्पेस महत्वकांक्षाएं उसके लांच इन्फ्रास्ट्रक्चर की तुलना में अधिक तेजी से विस्तार कर रही हैं। इसरो की यह महत्वाकांक्षा साहसिक प्रतीत होती है कि वह 2029 तक सालाना 50 ऑर्बिटल लांच करेगा। लेकिन उसने एक कैलेंडर वर्ष में कभी 10 लांच भी पूरी नहीं की हैं। आशावादी सार्वजनिक घोषणाएं, धीमा निर्माण, अपर्याप्त लांच सुविधाएं और सीमित पेलोड क्षमता बरकरार हैं। एलवीएमउ लो अर्थ ऑर्बिट तक लगभग 8,000 किलो का भार पहुंचा सकता है। इसलिए भारी सैटेलाइटस को लांच करने के लिए अंतर्राष्ट्रीय लांचर्स पर निर्भर होना पड़ता है।
लेख- नौशाबा परवीन के द्वारा