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नवभारत संपादकीय: ट्रंप के युद्धविराम से गुत्थी नहीं सुलझी, क्या होर्मुज की नाकाबंदी से मचेगा हाहाकार?
Iran-US Dispute: ईरान और अमेरिका के बीच बढ़ता तनाव वैश्विक संकट का रूप ले रहा है। ट्रंप की आर्थिक घेराबंदी और ईरान के कड़े रुख के बीच भारत की तेल आपूर्ति और चाबहार पोर्ट दांव पर है।
- Written By: आकाश मसने

डोनाल्ड ट्रंप (डिजाइन फोटो)
Donald Trump Iran Policy: अपने बड़े नेताओं व उच्च सेनाधिकारियों को खो देने के बाद भी ईरान अपने इशारों पर अमेरिका को नचा रहा है। दोनों देश झुकने को तैयार नही हैं और निर्णायक जीत हासिल करने में दोनों सक्षम नहीं हैं। ट्रंप ने युद्धविराम बढ़ाया है, लेकिन साथ ही होर्मुज की नाकाबंदी जारी है ताकि ईरान की इकोनॉमी को भारी नुकसान हो। दबाव के साथ संघर्ष विराम करने से शांति की राह नहीं बनती। अमेरिका यह जताना चाहता है कि समझौता वार्ता उसकी शर्तों पर ही होगी। दूसरी ओर ईरान ने वार्ता के प्रस्तावित दूसरे दौर को ठुकरा दिया। वह मानता है कि नाकाबंदी जारी रहते वार्ता करने का मतलब अमेरिकी दबाव को पूर्व शर्त के रूप में स्वीकार कर लेना होगा।
ईरान की मांग है कि अवरोध हटाया जाए तथा संतुलन कायम रखते हुए बराबरी से चर्चा की जाए। वह अमेरिका के सामने दबने वाला नहीं है। ऐसी स्थिति में शत्रुता कम नहीं होगी। इससे कभी भी संघर्ष विराम टूटकर दोनों देशों में नौसैनिक युद्ध हो सकता है। डोनाल्ड ट्रंप का दावा है कि ईरान का नेतृत्व दम तोड़ चुका है। दूसरी ओर ईरान का सख्त रवैया यह बताता है कि दोनों पक्ष दबाव व धमकी की कूटनीति अपना रहे हैं। दोनों पक्षों का रवैया इतना अड़ियल है कि कोई तीसरा पक्ष उनके बीच समझौता नहीं करा सकता।
‘आसिम मुनीर अमेरिका का दलाल’
ईरान ने तो खुलेआम पाकिस्तान के सेना प्रमुख आसिम मुनीर को अमेरिका का दलाल कहा है और उन पर डबल गेम खेलने का शक जताया है। ऐसे में साफ संकेत है कि ईरान अब मुनीर की कोई बात नहीं सुनेगा और उन्हें अमेरिका का संदेशवाहक या भोंपू मानेगा, अमेरिका ने मुनीर को इसलिए बिचौलिया बनाया था, क्योंकि उनका ताल्लुक ईरान के बड़े नेताओं से रहा है। ईरान के इस्लामिक रिवोल्युशनरी गार्ड कोर (IRGC) के उच्च अधिकारियों कमांडर हुसैन सलामी और कमांडर कासिम सुलेमानी से मुनीर की गहरी दोस्ती रही है। इसलिए अमेरिका ने मुनीर को मध्यस्थ रूपी मोहरे के रूप में इस्तेमाल किया। मुनीर की विफलता यह है कि वह ईरान को वार्ता की मेज पर नहीं ला पा रहे हैं।
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भारत पर क्या होगा असर?
यदि भारत के संदर्भ में विचार करें तो वह अपने राष्ट्रीय हितों को पहुंच रहे नुकसान को कब तक बर्दाश्त करेगा? भारत को 50 प्रतिशत कच्चा तेल, 60 प्रतिशत एलएनजी व संपूर्ण एलपीजी की सप्लाई होर्मुज खाड़ी से होती है। भारत का अमेरिका के साथ क्वाड गठबंधन है और इस नाते से प्रधानमंत्री मोदी चाहें तो ट्रंप से कह सकते हैं कि वह होर्मुज से भारतीय टैंकरों को भारतीय नौसेना के संरक्षण में आने दें। मुंबई के लिए चाबहार बंदरगाह कोलकाता की तुलना में नजदीक है। अमेरिका भारत की नौसेनाओं में परस्पर सहयोग रहा है। क्या भारत इस छोटे से समुद्री क्षेत्र में भी अपना दबदबा नहीं दिखा सकता? ईरान-अमेरिका संघर्ष में भारत भले ही तटस्थ बना रहे लेकिन अपने हितों के लिए उसे इन दोनों देशों से आग्रह करना होगा।
लेख- चंद्रमोहन द्विवेदी के द्वारा
Iran usa conflict donald trump policy strait of hormuz blockade impact on india oil supply
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