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नवभारत विशेष: ईरान-अमेरिका युद्ध हुआ तो हम पर क्या असर होगा?
Iran US War Analysis: ईरान-अमेरिका के बीच युद्ध जैसे हालात बने तो दुनिया और भारत पर क्या असर होगा? ईरान की सैन्य ताकत, प्रॉक्सी नेटवर्क और 10 हजार भारतीयों की सुरक्षा पर विश्लेषण किया गया है।
- Written By: दीपिका पाल

ईरान-अमेरिका युद्ध (सौ. डिजाइन फोटो)
नवभारत डिजिटल डेस्क: ईरान-अमेरिका के बीच युद्ध जैसे हालात बनते जा रहे हैं। ट्रंप की सनक और ईरान की दबंगई के चलते अगर युद्ध हुआ तो दुनिया और हम पर क्या असर होगा? ईरान का यह दावा है कि वह अमेरिकी हमले का ठोस संकेत मिलते ही इजराइल तथा आसपास के अमेरिकी सैन्य अड्डों को निशाना बनाना शुरू कर देगा। ईरान की सबसे बड़ी रणनीतिक ताकत है लेबनान में हिज्बुल्लाह, यमन में हृती, इराक-सीरिया में शिया मिलिशिया, इस प्रॉक्सी नेटवर्क के इस्तेमाल से वह बिना सीधे युद्ध के अमेरिका और उसके सहयोगियों पर दबाव बना सकता हैं।
शैडो वॉर में ईरान की यही मजबूती उसे पूर्ण युद्ध से अब तक बचाए रखी है और आगे भी काफी हद तक बचाएगी। ईरान जितना समझा जा रहा है उतना भी कमजोर नहीं है इसलिए वह अमेरिका के गले की ऐसी फांस बन सकता है जिसे न पूरी तरह निगला जा सके, न छोड़ा जा सके। इसलिए सीधे युद्ध में उतरने के बजाय वह प्रतिबंध, साइबर आक्रमण, सीमित हवाई हमला, आक्रामक बयानबाजी पर टिका रह सकता है। सत्ता-परिवर्तन के लिए अस्थिरता पैदा करने का पश्चिम का इतिहास रहा है। इसलिए ईरान में यह आरोप पूरी तरह निराधार नहीं। असल में संकट के मुख्य खलनायक खामेनेई हैं, जिनकी सरकार के आर्थिक कुप्रबंधन, राजनीतिक दबंगई इसके लिए दोषी हैं। ईरान आज उन्हीं के चलते आर्थिक संकट, प्रतिबंधों, ऊर्जा-जल किल्लत, मुद्रा अवमूल्यन और सामाजिक असंतोष के बहुस्तरीय दबाव में है।
सत्ता परिवर्तन की मांग वालों को दंगाई और विदेशी समर्थित किराए के सैनिक बताकर ऐलान किया कि ‘दंगों’ में शामिल सभी लोग खुदा के खिलाफ युद्ध छेड़ने के दोषी हैं, जिसकी सजा मौत है। इससे मामला और भड़का, देशभर में जेन-जी आक्रोश में आ गया और हर महीने लगभग 7 डॉलर कैश की मदद का ऐलान भी नाकाम साबित हुआ। आज ईरान उबाल के उस बिंदु पर है जिसमें अस्थिरता बरकरार रहेगी और गृहयुद्ध या तख्तापलट होने से पहले दमन और तेज होगा। अमेरिका में रह रहे निर्वासित रजा पहलवी ने आंदोलनकारियों को समर्थन हुए खुद को सत्ताशीर्ष का विकल्प बताया तो है पर फिलहाल उनके ईरान लौटने की संभावना क्षीण है।
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उम्मीद यही है कि ट्रंप परोक्ष हवाई हमले, सैन्य ठिकानों को निशाना भले बनाएं पर सीधा हस्तक्षेप टालेंगे, तमाम सैन्य बढ़त के बावजूद सीधा युद्ध अमेरिका के लिए भी महंगा और अनिश्चित होगा पर ट्रंप युद्ध पर उतारू हो गए तो क्या होगा ? ईरान का रक्षा बजट 40 अरब डॉलर है, जो अमेरिकी रक्षा बजट 800 अरब डॉलर के मुकाबले कुछ भी नहीं। अमेरिका के पास ईरान के नजदीक कई सैन्य अड्डे हैं, सैटेलाइट-आधारित इंटेलिजेंस, स्टील्थ विमान हैं। हवाई ताकत के मामले में अमेरिकी एफ 35, एफ 22, अवाक्स जैसे लड़ाकू विमानों, बी-2 बांबरों के सामने कमजोर वायुसेना वाला ईरान कब तक टिकेगा? अमेरिका द्वारा बड़े पैमाने पर ऐसे हवाई हमले संभव हैं, जो ईरान की वायु रक्षा और एयरबेस को शुरुआती चरण में ही भारी नुकसान पहुंचा देगा।
ईरान के पास सैनिक अधिक होने के बावजूद टैंक-बख्तरबंद प्लेटफॉर्म पुराने हैं, निगरानी, तकनीक और बाकी हथियारों के मामले में वे अमेरिका से बहुत पीछे हैं जिससे खुले मैदान की सीधी लड़ाई में वे पिछड़ सकता है। पर मिसाइलें ईरान की ताकत हैं। उसकी बैलिस्टिक और क्रूज मिसाइलें अमेरिकी ठिकानों, इजराइल और खाड़ी देशों के लिए वास्तविक खतरा बन सकती है।
10,000 भारतीयों की सुरक्षा का सवाल
ईरान के पास भले घोषित तौर पर परमाणु हथियार न हों पर 60 फीसद से अधिक यूरेनियम संवर्धन कार्यक्रम चिंता का विषय तो है। इस दौरान इजराइल की भूमिका देखनी होगी। यह तय है कि चीन बयानबाजी और कूटनीतिक वित्तीय समर्थन तक सीमित रहेगा, सीधी सैन्य मदद की संभावना कम ही है। भारत के लिए ईरान ऊर्जा, कनेक्टिविटी और क्षेत्रीय संतुलन का अहम स्तंभ है।
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हमें रणनीतिक स्वायत्तता के साथ तटस्थ रुख रखते हुए अमेरिका-ईरान संवाद को बढ़ावा देने की बात करनी होगी। हमें कूटनीति संयम, संवाद और नागरिक सुरक्षा तीनों पहलू पर समान बल देना होगा। संतुलन बनाते हुए चाबहार बंदरगाह, ऊर्जा सुरक्षा तथा ईरान में रह रहे अपने 10,000 से अधिक नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करनी होगी।
लेख- संजय श्रीवास्तव के द्वारा
Iran us war scenario global impact india analysis
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