भारतीयों पर भी निगरानी, इजरायली सॉफ्टवेयर पेगासस से जासूसी का आरोप साबित
भारत में अनधिकृत रूप से नागरिकों के खिलाफ पेगासस के इस्तेमाल के आरोपों की जांच की मांग को लेकर सुप्रीम कोर्ट में अनेक याचिकाएं दायर की गई थीं।
- Written By: मृणाल पाठक
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नवभारत डेस्क: आखिर 5 वर्षों की कानूनी लड़ाई के बाद अमेरिकी कोर्ट में सिद्ध हो गया कि इजराइली टेक कंपनी एनएसओ ग्रुप ऑफ टेक्नोलॉजीज ने अपने सॉफ्टवेयर पेगासस के जरिए अमेरिकी कानूनों और वाट्सएप की सेवा शर्तों का उल्लंघन किया। कोर्ट के इस फैसले से इस सॉफ्टवेयर को बनानेवाली कंपनी व उसके मालिक को करारा झटका लगा है। पेगासस से की गई जासूसी की वजह से निजता और सुरक्षा का उल्लंघन हुआ जिनका लोकतंत्र में विशेष महत्व है।
भारत में पेगासस द्वारा जासूसी का मामला चर्चित हुआ था। जिन 1400 लोगों की जासूसी किए जाने का आरोप है, उनमें 300 से अधिक भारत के हैं। इनमें पत्रकारों, मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और सरकारी अधिकारियों का समावेश है। भारत में अनधिकृत रूप से नागरिकों के खिलाफ पेगासस के इस्तेमाल के आरोपों की जांच की मांग को लेकर सुप्रीम कोर्ट में अनेक याचिकाएं दायर की गई थीं।
2021 में सुप्रीम कोर्ट ने इन आरोपों की जांच के लिए तकनीकी विशेषज्ञों की समिति का गठन किया था। अगस्त 2022 में इस समिति को उसके द्वारा जांचे गए 5 मोबाइल फोन में स्पाईवेयर के उपयोग का कोई निर्णायक सबूत नहीं मिला लेकिन साथ ही समिति ने नोट किया कि केंद्र सरकार ने जांच समिति के साथ कोई सहयोग नहीं किया। समिति की रिपोर्ट अभी तक सीलबंद है जिसे सार्वजनिक रूप से जाहिर नहीं किया गया।
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यह पूछे जाने पर कि क्या सरकार फोन टेप करती है या पेगासस का उपयोग करती है, गृह मंत्रालय ने लोकसभा में बताया था कि आईटी एक्ट 2000 तथा इंडियन टेलीग्राफ एक्ट 1885 के अनुसार केंद्र व राज्य सरकारें ऐसा कदम उठा सकती हैं। वह फोन पर हो रही बातचीत पर निगरानी रखने, उसे रिकार्ड करने के लिए अधिकार संपन्न हैं। इसके लिए केंद्र ने 10 एजेंसियों को अनुमति दे रखी है।
भारत में ऐसा कोई राष्ट्रीय सुरक्षा कानून नहीं है जो आवश्यक और मनमानी कार्रवाई को एक दूसरे से अलग कर सके। सुप्रीम कोर्ट में सालिसिटर जनरल ने दलील दी थी कि कोई भी देश यह नहीं बताता कि उसने कौन सा सॉफ्टवेयर इस्तेमाल किया है या नहीं किया है। उल्लेखनीय है कि आंध्रप्रदेश की क्षेत्रीय पार्टियों ने भी एक दूसरे पर पेगासस से जासूसी करने का आरोप लगाया था।
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आज के युग में तकनीक बहुत आगे बढ़ चुकी है। कौन कहां किसकी जासूसी कर रहा है, कहा नहीं जा सकता। खास तौर पर राजनीति, व्यवसाय घरानों से जुड़े लोगों के लिए यह गहरी चिंता का विषय है। इससे व्यक्ति की निजता या प्राइवेसी का उल्लंघन होता है। जहां तानाशाही है, वहां की बात अलग है, लेकिन लोकतंत्र में किसी की जासूसी क्यों होनी चाहिए? इससे किसी को ब्लैकमेल भी किया जा सकता है।
लेख- चंद्रमोहन द्विवेदी द्वारा
