

Indian Rupee Weakening Impact: डॉलर के मुकाबले रुपया बुरी तरह कमजोर होने की वजह से अर्थव्यवस्था पर विपरीत प्रभाव पड़ने लगा है। आयात बिल, कर्ज के पुनर्भुगतान व सब्सिडी पर बोड़ा आने से बजट अनुमान प्रभावित हुए हैं। रुपए की गिरावट की अनेक वजह हैं, जिनमें क्रूड ऑयल के बढ़ते दाम, विदेशी पूंजी का बाहर जाना तथा वैश्विक स्तर पर डॉलर की मजबूती शामिल है। रुपए का कमजोर होते जाना अर्थव्यवस्था के लिए गंभीर चेतावनी है। अमेरिका-ईरान युद्ध के पहले से ही रुपया दबाव में था।
विदेशी निवेशक भारतीय स्टॉक मार्केट से पूंजी निकाल रहे थे। वह रुपया बेचकर डॉलर खरीद रहे हैं। हमारी अर्थव्यवस्था काफी हद तक आयात पर निर्भर है। हमारे कोर सेक्टर व मैन्युफैक्चरिंग सशक्त नहीं हैं। रुपया कमजोर होने से क्रूड ऑयल, खाद्य तेल, इलेक्ट्रॉनिक्स, खाद, मशीनरी का आयात महंगा हो गया है। विदेश में पढ़ाई तथा विदेश यात्रा का खर्च बहुत बढ़ गया है। घरेलू बजट पर भी इसका विपरीत असर पड़ा है। विदेशी प्रत्यक्ष निवेश में तेजी से कमी आई है।
वह जीडीपी के 2.5 प्रतिशत से घटकर 0.8 प्रतिशत पर आ गया। लोगों की क्रयशक्ति घटी है। भारत अपनी आवश्यकता का ३० प्रतिशत क्रूड ऑयल विदेश से मंगाता और उसका डॉलर में भुगतान करता है। अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए भारत को अधिक डॉलर चाहिए, ई-वाहनों का प्रचार किया जा रहा है, लेकिन उनकी बैटरी खरीदने पर भी विदेशी मुद्रा खर्च होती है।
बैटरी मुश्किल से 4 वर्ष चलती है। उनके रिप्लेसमेंट की लागत ज्यादा आती है। यह भी कहा जा रहा है कि वास्तव में डॉलर मजबूत होता जा रहा है। वैश्विक अनिश्चितता के बीच विभिन्न देशों के लोग अपना धन डॉलर में संचित रखना चाहते हैं। अमेरिका में पहले बचत पर व्याज काफी कम था, जो अब बढ़ा दिया गया है। आर्थिक दबाव के बीच रिजर्व बैंक ने निर्यात प्रतिस्पर्धा को कायम रखने के लिए रुपए को नरम होने दिया।
विदेशी मुद्रा कोष से डॉलर बेचकर रुपए को मजबूत करना उसे सुसंगत नहीं लगा। प्रधानमंत्री मोदी ने हाल ही में अपने नीदरलैंड दौरे में चेतावनी दी थी कि वैश्विक युद्ध, महामारी तथा ऊर्जा संकट ने 'विनाश के दशक' को जन्म दिया है। यदि इसे शीघ्र दुरुस्त नहीं किया गया तो कई दशकों में की गई तरक्की मटियामेट हो जाएगी तथा विश्व की बड़ी आबादी को फिर गरीबी से जूझना होगा।
रुपया कभी भी डॉलर की तुलना में इतना कमजोर नहीं रहा। अन्य देशों की मुद्राओं पर भी संकट देखा जा रहा है। लोग अपनी जीवनशैली से समझौता नहीं कर सकते। आज किसी की मानसिकता नहीं है कि 1991 से पहले वाली स्थितियों में लौट जाए जब संसाधन सीमित थे और लोग कम खर्च में काम चला लेते थे। नई आर्थिक नीति अपने साथ उपभोक्तावाद लाई, जिसने मितव्ययता की भावना को कमजोर कर दिया। आज इस बात की जरूरत है कि आयात कम करते हुए अपने आर्थिक आधार को सुदृढ़ किया जाए।
लेख- चंद्रमोहन द्विवेदी के द्वारा