

संसद में चर्चा, सहमति और संवाद की परंपरा कमजोर होने पर चिंता।
2019 से 2023 के बीच सांसदों के निलंबन में 13 गुना वृद्धि का दावा।
2023 में राज्यसभा के 47% विपक्षी सदस्यों को निलंबित किए जाने का उल्लेख।
संसद की सुरक्षा में चूक पर गृह मंत्री से जवाब मांगने के दौरान विपक्षी सांसदों पर कार्रवाई का आरोप।
Parliament Debate and Opposition MP Suspension: विपक्ष का यह आरोप सोचने पर विवश करता है कि जो टि संसद पहले वैचारिक आदान-प्रदान का मंच हुआ करती थी, वहां सत्ता पक्ष का एकाधिकार देखा जाने लगा है। वहां चर्चा, आम सहमति, सामंजस्य की भावना नहीं रह गई है, जिसका स्वप्न संविधान निर्माताओं ने देखा था। 2019 से 2023 के बीच सांसदों को निलंबित किए जाने के मामलों में 2009 से 2014 के बीच की 15वीं लोकसभा की तुलना में 13 गुना वृद्धि हुई है। 2014 के बाद से बीजेपी का कोई भी सांसद निलंबित नहीं किया गया।
राज्यसभा को वरिष्ठों का सदन (हाउस ऑफ एल्डर्स) माना जाता है, जहां जल्दबाजी में विधेयक पारित करने की बजाय उसकी नियंत्रण और संतुलन के आधार पर जांच होती है तथा उच्चस्तरीय शालीनतापूर्ण बहस होती है। इतने पर भी 2023 में राज्यसभा के 47 प्रतिशत विपक्षी सदस्यों को निलंबित किया गया। इन सांसदों के खिलाफ इसलिए कार्रवाई की गई, क्योंकि वह गृहमंत्री से संसद की सुरक्षा भंग होने के मुद्दे पर बयान देने की मांग कर रहे थे। हुआ यह था कि बीजेपी के एक सांसद ने ऐसे लोगों को प्रवेश पास दिए थे, जिन्होंने रेलिंग से कूदकर संसद की कार्यवाही में बाधा डालने का प्रयास किया था। इस पर चर्चा टालने के लिए विपक्षी सदस्यों को निलंबित किया गया था।
संसद में जल्दबाजी में विधेयक पारित होने और विपक्ष की भूमिका पर सवाल
सरकार ने विपक्ष की अनुपस्थिति में केवल 6 सांसदों की मौजूदगी में 30 मिनिटों के भीतर टैक्स जुटाने से संबंधित तात्कालिक बिल पास करवा लिया था। दूरसंचार विधेयक पर चर्चा के समय सदन में सिर्फ 8 सदस्य मौजूद थे।
2019 के बाद से 100 से भी अधिक विधेयक 2 घंटे से भी कम समय में पारित करवाए गए, जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन विधेयक 2019 से राज्य का दर्जा छीन लिया गया था। यह बिल एक ही दिन में पास करा लिया गया। लोकसभा के उपाध्यक्ष का पद परंपरागत रूप से विपक्षी सांसद को दिया जाता रहा है, लेकिन 2019 से यह पद खाली पड़ा हुआ है। पहले 10 में से 7 विधेयक जांच के लिए उपसमितियों के पास भेजे जाते थे, लेकिन अब केवल 10 में से 3 विधेयकों पर उपसमितियां विस्तार से चर्चा करती हैं।
सरकार जानकारी देने से बचना चाहती है। संसद में किए गए सवालों के जवाब में कहा जाता है कि कोई डाटा उपलब्ध नहीं है। सरकार अभी भी लोक कल्याण योजनाओं के लिए 2011 के आंकड़ों पर निर्भर है। इस वजह से 15 करोड़ से भी ज्यादा लोगों को सार्वजनिक वितरण प्रणाली का लाभ नहीं मिल पा रहा है।
कहा जाता है कि सरकार संसद के प्रति जवाबदेह है और संसद देश की जनता के प्रति जवाबदेही रखती है, लेकिन इस समय ऐसी स्थिति देखी नहीं जाती। संस्थाओं को उनके अधिकारों से बंचित किया जा रहा है। संसद में बहस को हतोत्साहित करना और जवाबदेही टालना लोकतंत्र में विररंगति को दर्शाता है।
लेख- चंद्रमोहन द्विवेदी के द्वारा