नवभारत संपादकीय: वायुसेना में लड़ाकू विमानों की कमी, Tejas से AMCA तक क्या है सरकार की तैयारी?

Indian Air Force Strength: MiG-21 की विदाई के बाद भारतीय वायुसेना के सामने लड़ाकू विमानों की कमी बड़ी चुनौती है। जानें हर साल 36-40 नए विमानों की जरूरत और Tejas Mk1A, Mk2 व AMCA की तैयारी।
IAF Fighter Squadron Shortage
अमर प्रीत सिंहफोटो सोर्स- नवभारत डिजाइन
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IAF Fighter Squadron Shortage: भारतीय वायुसेना प्रमुख एयर चीफ मार्शल अमरप्रीत सिंह ने वायुसेना दिवस के पूर्व रक्षा संबंधी जिन महत्वपूर्ण मुद्दों को उठाया है, उन पर विचार जरूरी है। वायुसेना से मिग-21 विमानों की विदाई के बाद उसे 36 से 40 लड़ाकू विमानों की जरूरत है। रक्षा विशेषज्ञ भी अनेक वर्षों से इस आवश्यकता पर जोर देते रहे हैं। इसके लिए प्रयास शुरू हैं लेकिन वास्तव में लड़ाकू विमानों की तादाद बढ़ नहीं पाई है।

भारतीय वायुसेना को पश्चिमी और उत्तरी सीमा से खतरे को देखते हुए 42 लड़ाकू स्क्वाड्रन को मंजूरी दी गई है लेकिन फिलहाल इनकी संख्या 30 से भी कम है। इस कमी को देखते हुए तेजस एमके 1 ए तथा मार्क 2 विमानों का निर्माण प्रस्तावित है। 5 वीं पीढ़ी के विमान तैयार करने का भी विचार है लेकिन इसमें विलंब हो रहा है।

राफेल से तेजस तक, लड़ाकू विमानों में आत्मनिर्भरता की चुनौती

फ्रांस से राफेल विमान खरीदी का निर्णय इस वर्ष हो सकता है। रूस अपना सुखोई-57 विमान देने के लिए तैयार है लेकिन उसे खरीदने का निर्णय राजनीतिक स्तर पर नहीं लिया जा सका। विदेशी विमान खरीदने में सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि उसका इंजन हम भारत में नहीं बना सकते। अमेरिका के एफ-16 की तुलना में फ्रांस का राफेल विमान कम दाम में उपलब्ध है व अधिक कार्यक्षम माना जाता है। भारत के पास राफेल की स्क्वाडून है तथा आगे भी इन विमानों की खरीदारी होती रहेगी।

विदेश से विमान खरीदी की प्रक्रिया धीमी है। आज भी भारत इस मामले में विदेश पर निर्भर है। भारतीय वायुसेना में अधिकांश विमान रूसी ही रहे हैं जैसे कि मिग 19, मिग 21, सुखोई! मिग विमानों को रिटायर किया जा चुका है। हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड वर्षभर में 20 से 24 तेजस एमके-1 विमान तैयार कर सकती है जो लाइट कॉम्बैट एयरक्राफ्ट है।

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वायुसेना दिवस पर संदेश

विमानों के इंजन भी विदेशी हुआ करते हैं। फ्रांस से इस मुद्दे पर करार हो सकता है कि वह राफेल विमानों को भारत में बनाए और उसकी निर्माण तकनीक भारत को दे।

यद्यपि वर्तमान समय में युद्ध के दौरान प्रक्षेपास्त्र, ड्रोन तथा मानवरहित विमानों का महत्व बढ़ गया है लेकिन फिर भी लड़ाकू विमानों की अपरिहार्यता को कम नहीं आंका जा सकता। हवाई युद्ध में यह अतिशय आवश्यक है। मानव और मशीन का तालमेल कभी भी कम नहीं होगा।

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लड़ाकू विमानों की कमी दूर करना जरूरी

हमारी वायुसेना के पायलट इतने कुशल हैं कि किसी भी प्रकार के विमान को भली भांति उड़ा सकते हैं। ऑपरेशन सिंदूर के समय और इसके पहले के युद्धों में भी उन्होंने अपना शौर्य दिखाया था। अमेरिका, रूस और चीन भी लड़ाकू विमानों पर पूरा भरोसा करते हैं।

वायुसेना की ताकत ऐसे विमानों से ही आंकी जाती है। भारतीय वायुसेना की 8 अक्टूबर को 94 वीं वर्षगांठ है। लड़ाकू विमानों की आवश्यकता को लेकर वायुसेना प्रमुख का स्पष्ट वक्तव्य सरकार की आंख खोलने वाला है। इस दिशा में यथाशीघ्र कदम उठाना होगा।

लेख- चंद्रमोहन द्विवेदी के द्वारा

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