
– लोकमित्र गौतम
यूनाइटेड नेशंस पॉपुलेशन फंड (यूएनएफपीए) के मुताबिक अब भारत की जनसंख्या चीन से 30 लाख ज्यादा है. यही नहीं भारत की आबादी कम से कम अगले 27 सालों तक लगातार बढ़ेगी और इस दौरान चीन की आबादी घटेगी. विशेषज्ञों का मानना है कि साल 2050 के आसपास भारत की आबादी करीब 167 करोड़ के आसपास होगी, जबकि चीन की आबादी घटकर 130 करोड़ के आसपास आ जायेगी. अभी भारत की आबादी 142 करोड़ के पार हो गई है.
आखिर सबसे ज्यादा आबादी की इस उपलब्धि को कैसे देखें? इसे भारत की सबसे बड़ी ताकत मानें या इसे सबसे बड़ी कमजोरी समझें? एक खेमे का कहना होता है कि भारत की सबसे बड़ी समस्या आबादी है. भारत में जितना विकास होता है, बढ़ती आबादी के कारण वह कहीं नहीं दिखता. लेकिन जो दूसरा खेमा है, वह भारत की इस बेइंतहां आबादी को किसी तरह का अभिशाप नहीं बल्कि वरदान मानता है और अगर तथ्यों के हिसाब से देखें तो इसे भी नहीं झुठलाया जा सकता. क्योंकि यह भारत की युवा आबादी ही है, जिसकी बदौलत हर साल दुनिया से करीब 72-73 अरब डॉलर की विदेशी मुद्रा भारत आती है. यह इतनी बड़ी रकम है, जितनी दुनिया के दर्जनों देशों का सालाना जीडीपी भी नहीं होता.
चीन इसी फिराक में रहता है कि कैसे हर मामले में भारत को नीचा दिखाया जाए. चीन ने जनसंख्या नियंत्रण के लिए न सिर्फ सख्त बल्कि बेहद अमानवीय प्रयास तक किए हैं. चीन की ‘वन चाइल्ड पॉलिसी’ पूरी दुनिया में मानवाधिकार संगठनों की आलोचना का शिकार हुई है. साथ ही अपनी इसी सख्त नीति के चलते आज चीन जनसंख्या घटोतरी के दुष्चक्र में फंस गया है और वह किस कदर परेशान है, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि चीन लगातार घट रही अपनी आबादी से परेशान होकर युवाओं को जनसंख्या बढ़ाने के लिए तरह तरह के दर्जनों प्रोत्साहन दे रहा है. मगर तमाम कोशिशों के बावजूद चीन को इसमें कामयाबी नहीं मिल रही. विशेषज्ञ मानते हैं कि अगले साल से ही चीन में आबादी नकारात्मकता की दिशा में बढ़ चलेगी. चीन में 20 करोड़ लोग 65 वर्ष से ज्यादा उम्र के हैं.
जैसे ही यूएनएफपीए यह घोषणा की कि अब जनसंख्या के मामले में दुनिया का शीर्ष देश भारत है, चीन एक जली कटी टिप्पणी करने से बाज नहीं आया. चीन ने कहा कि ‘उसके पास 90 करोड़ कुशल कामगारों का जनबल है, जो चीन को अधिक जनसंख्या से मिलने वाले लाभों को केवल सुनिश्चित करता है.चीन के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता वांग वेनविंग ने भारत का बिना नाम लिए उपहास उड़ाने के अंदाज में कहा, ‘जनसंख्या का लाभ संख्या पर नहीं, जनबल की गुणवत्ता पर निर्भर करता है. जनसंख्या के साथ उसका प्रतिभावान होना भी जरूरी है.’
भारतीय युवाओं की उर्वरता देख करके, जान करके, समझ करके भी चीन स्वीकार नहीं करना चाहता. वह जताना चाहता है कि भारतीय जनसंख्या दुनिया पर बोझ है. जबकि हकीकत यह है कि पूरी दुनिया भारत की युवा आबादी को अपने भविष्य के रूप में देख रही है. भारत आज इतनी बड़ी तादाद में अगर विदेशी मुद्रा हासिल कर रहा है, तो इसकी सबसे बड़ी वजह भारत की युवा और योग्य आबादी है जो वर्तमान और भविष्य की सबसे बड़ी इंडस्ट्री, आईटी को अपनी प्रतिभा और मेहनत के बल पर साधे हुए है.
भारतीय युवा किस तरह पूरी दुनिया के लिए एक भविष्य हैं, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि दुनिया के अलग अलग मंचों पर रखे आंकड़ों के हिसाब से देखें तो इस समय दुनिया में हर साल जो करीब 600 खरब डॉलर से ज्यादा की संपत्ति बन रही है, उसमें से अकेले 20 से 25 फीसदी संपत्ति भारतीय युवा बना रहे हैं.
क्योंकि भारत दुनिया का सबसे युवा देश है. भारत में 21 फीसदी आबादी विशुद्ध रूप से युवाओं की है, वैसे यूएनएफपीए द्वारा जारी आंकडों के मुताबिक भारत में 15 से 64 साल तक के लोगों की संख्या कुल आबादी के 68 फीसदी है. यह विशुद्ध रूप से बेहद कार्यक्षम लोगों की आबादी है. इस मामले में हम चीन से काफी आगे हैं. क्योंकि चीन में युवाओं की आबादी महज 14 फीसदी है.
इसका मतलब है कि साल 2037 से 2040 के बीच में ही चीन को जरूरी वर्कफोर्स पाना मुश्किल होने लगेगा. जबकि भारत अगले 27 सालों तक न सिर्फ लगातार जनसंख्या के मामले में बहुत धीमी रफ्तार से आगे ही बढ़ता रहेगा बल्कि भारत में इस दौरान युवाओं की आबादी में भी थोड़ी बढ़ोत्तरी ही होगी, कमी नहीं. दुनिया के कारपोरेट सेक्टर में साल 2035 के बाद से भारतीय युवाओं का जबरदस्त एकाधिकार होगा. अगर हमने अपनी आबादी को वास्तव में सम्पत्ति में परिवर्तित कर लिया, तो भारत के स्वर्णिम भविष्य की अमरगाथा युवाओं की आबादी लिखेगी और चीन को आईना दिखाएगी.






