प्रतीकात्मक तस्वीर ( सोर्स: सोशल मीडिया )
Cross Border Infiltration India: 1950 की शांति-सहयोग संधि के चलते तकरीबन 1800 किमी की भारत और नेपाल के बीच खुली सीमा इस घुसपैठ की बड़ी वजह है। बिहार, पूर्वी उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के सीमावर्ती जिलों में इसके चलते गहरे सामाजिक-आर्थिक संपर्क हैं पर यह सुरक्षा दृष्टि से अत्यधिक संवेदनशील है।
सिर्फ बांग्लादेशी ही नहीं, म्यांमार के घुसपैठिए भी बांग्लादेश से होते हुए नेपाल के रास्ते देश में घुसपैठ कर रहे हैं। दो महीने पहले जब कुछ बांग्लादेशी इस रास्ते से घुसपैठ करते हुए पकड़े गए थे, तो इसके बाद खुफिया रिपोर्टस में चेतावनी दी गई थी कि यहां के घुसपैठिए एजेंटों से आधार कार्ड बनवाकर बेंगलुरु और हैदराबाद तक पहुंचने लगे हैं।
बांग्लादेश चुनावों से पहले इस रास्ते से घुसपैठ और तस्करी तेजी से बढ़ी थी और एसएसबी ने बिहार तथा उत्तर प्रदेश की नेपाल से सटी सीमा पर अलर्ट जारी किया था। भारत, नेपाल में स्थिर सरकार चाहता है, क्योंकि अस्थिर नेपाल बांग्लादेशी घुसपैठियों के लिए एक अनुकूल रास्ता बना रहेगा।
2023 में नेपाल के पीएम के।पी। शर्मा ओली ने कहा था कि खुली सीमा का ‘अनचाहे तत्वों’ द्वारा दुरुपयोग न हो, इसका वे खास तौर पर ख्याल रखेंगे। 2025 में भारत-नेपाल ने अवैध प्रवेश और तस्करी रोकने पर सहमति जताई थी, लेकिन पहले तो नेपाली जेन जी आंदोलन ने अस्थिरता बढ़ाई फिर अब राजनीतिक स्थिरता के लिए नेपाल में चुनाव होने जा रहे हैं।
नेपाल चुनावों का परिणाम तकरीबन तय है। संकेत हैं कि किसी एक दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिलेगा, गठबंधन की सरकार बनेगी। राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी यानी आरएसपी का प्रबल उभार उसे तीसरे या हद से हद दूसरे नंबर तक ही पहुंचा पाएगी।
नेपाली कांग्रेस में खटपट के बावजूद पारंपरिक वोट बैंक कमोबेश अक्षुण्ण रहना, यूएमएल द्वारा कई इलाकों में अपना पारंपरिक आधार बनाए रखना, माओवादी सेंटर की घटती परंतु कुछ सीटों पर मजबूती मतलब वोट बटेंगें तिस पर आरपीपी जैसे दलों की अत्यंत सीमित सीटें आने के बावजूद त्रिशंकु सदन में ‘किंगमेकर’ की स्थिति, कुछ सीटों पर ‘टेक्टिकल वोटिंग’ की भी संभावना है।
नेपाल की मिश्रित चुनाव प्रणाली बहुदलीय परिणाम देती है। इसके चलते सरकारें बनीं, टूटीं, फिर बनीं। के। पी। शर्मा ओली,शेरबहादुर देउवा और पुष्पकमल दहल ‘प्रचंड’ के बीच सत्ता-परिवर्तन की राजनीति ने स्थिरता को बार-बार चुनौती दी।
यदि इस चुनाव में भी खंडित जनादेश आता है, तो वैचारिक विरोधाभासों से भरे गठबंधन बनेंगे। भारत के लिए असल चिंता यही है कि क्या चुनावों के बाद नेपाल की नई सरकार किसी सुविचारित सकारात्मक दीर्घकालिक रणनीतिक निरंतरता रख पाएगी या घरेलू राजनीति के दबाव में अपने गठबंधन दलों के प्रभाव के चलते बार-बार रुख बदलेगी? नेपाल की राजनीति में समय-समय पर ‘भारत विरोधी कार्ड’ खेला जाता रहा है।
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2015 के संविधान विवाद और तथाकथित नाकाबंदी की स्मृति अभी भी राजनीतिक विमर्श में है। सीमा विवाद-लिपुलेख, कालापानी और लिम्पियाधुरा जैसे तमाम भावनात्मक मुद्दे आज भी जिंदा हैं।
आरएसपी स्वयं को ‘स्वतंत्र विदेश नीति’ का समर्थक बताती है और खुले झुकाव से बचने की बात करतो है। यूएमएल ने अतीत में चीन के साथ बुनियादी ढांचा सहयोग को आगे बढ़ाया है। माओवादी सेंटर वैचारिक रूप से संतुलन की बात करता है।
आगामी 5 मार्च को पड़ोसी देश नेपाल में आम चुनाव होने जा रहे हैं। यह चुनाव नेपाल के हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव के 275 सदस्यों को चुनने के लिए होंगे। नेपाल का आम चुनाव भी भारत की राजनीति के लिए वही महत्व रखता है, जी महत्व बांग्लादेश के आम चुनावों का था।
इसलिए हाल में नेपाल के रास्ते से बांग्लादेशियों की घुसपैठ की जो रफ्तार तेज हो गई थी, उसको देखते हुए नेपाल के आम चुनाव भी उससे प्रभावित हो सकते हैं। भारत इस बात पर विशेष नजर रख रहा है।
क्योंकि यह केवल घुसपैठ का मामला नहीं है, बल्कि क्षेत्रीय सुरक्षा और कूटनीतिक संबंधों की परीक्षा का प्रश्न भी है। ऐसे समय जब चुनाव में व्यस्त होने के कारण नेपाल का शासन-प्रशासन इस पर ज्यादा ध्यान नहीं दे पा रहा। इसी का फायदा उठाकर बांग्लादेशी घुसपैठिए पिछले काफी दिनों से भारत में प्रवेश के लिए नेपाल रूट को अपनाने में लगे हुए हैं।
–लेख संजय श्रीवास्तव के द्वारा