नवभारत विशेष: साझेदारी चाहिए, कुर्बानी देने को कोई तैयार नहीं, विपक्षी एकता सबसे बड़ी चुनौती…
Opposition Alliance Politics: विपक्षी दल भाजपा के खिलाफ एकजुटता की बात तो कर रहे हैं, लेकिन राज्यों में क्षेत्रीय हित और सीट बंटवारे के मतभेद साझा रणनीति के रास्ते में बाधा बन रहे हैं।
- Written By: अंकिता पटेल
विपक्षी गठबंधन,(सोर्स: सोशल मीडिया)
INDIA Alliance Internal Contradictions: हाल के चुनाव में तृणमूल कांग्रेस भाजपा से बुरी तरह से हार गई है। लेकिन हारने के बावजूद टीएमसी का यही मानना है कि कांग्रेस और वामपंथी पार्टियां बंगाल से दूर ही रहें तो विपक्षी एकता के लिए सही है। विपक्षी पार्टियां भाजपा को हराने के लिए एकजुट तो होना चाहती हैं, लेकिन हर पार्टी यह मानकर चलती है कि इस एकता की कीमत उसे अपनी ताकत का बंटवारा करके न चुकानी पड़े, जो स्थानीय पार्टी जहां मजबूत है, वहां वह किसी तरह का गठबंधन नहीं चाहती।
वह चाहती हैं कि विपक्षी पार्टियां उन्हें एकमुश्त और एकतरफा समर्थन दें, जहां वह पार्टी कतई ताकतवर नहीं है, वहां वह मिलकर चुनाव लड़ना चाहती है ताकि उसे दूसरे से फायदा मिल सके। आम आदमी पार्टी कांग्रेस से दिल्ली और पंजाब में किसी भी किस्म का समझौता नहीं करना चाहती।
उसे लगता है कि इन दोनों जगहों पर अकेले जीत सकती है। लेकिन वहीं आम आदमी पार्टी उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में कांग्रेस से गठबंधन करने के लिए दबी जुबान से तैयार है। विपक्षी पार्टियों के गठबंधन इंडिया एलायंस की बैठक तो हुई, लेकिन उस बैठक का साझे गठबंधन के रूप में कोई फैसला सामने नहीं आ सका।
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क्षेत्रीय वर्चस्व की राजनीति विपक्षी एकता में सबसे बड़ी बाधा
अखिलेश यादव के नेतृत्व वाली समाजवादी पार्टी और तेजस्वी यादव के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय जनता दल कांग्रेस क्रमशः उत्तर प्रदेश और बिहार में गठबंधन करना चाहती है, लेकिन इस शर्त पर कि कांग्रेस सिर्फ इन प्रदेशों में नामभर की पार्टी रहे और उनके पीछे-पीछे चले। इन दोनों प्रदेशों में ये पार्टियां कांग्रेस के साथ के लिए खुद सत्ता में आना चाहती हैं।
क्षेत्रीय दल हर जगह कांग्रेस का वोट बैंक तो कब्जाना चाहते हैं, लेकिन कहीं पर भी अपने वोट बैंक के जरिए कांग्रेस को किसी तरीके से फायदा दिलवाने के पक्ष में नहीं है। विपक्षी पार्टियां भाजपा का मुकाबला करने के लिए कांग्रेस के साथ गठबंधन तो करना चाहती हैं, लेकिन वह चाहती हैं कि गठबंधन के बावजूद कांग्रेस उनके इशारे पर चलने वाली दूसरे या तीसरे नंबर की पार्टी रहे, किसी तरह बराबरी या सत्ता में भागीदारी की मंशा न पाले।
विपक्ष की सबसे बड़ी समस्या अपने राजनीतिक भूगोल को अपने पास बनाए रखने की है। हर विपक्षी दल चाहता है कि उसके क्षेत्र में कोई साथी गठबंधन की पार्टी अपनी जमीन तलाशने की कोशिश न करें और यही विपक्षी एकता के लिए सबसे बड़ी बाधा है। क्योंकि हर विपक्षी पार्टी की अपनी एक टेरिटरी है।
आपसी अविश्वास और स्वार्थ से विपक्षी एकता की राह कठिन
बंगाल में ममता बनर्जी, भले इस चुनाव में बुरी तरह से भाजपा की आंच में जल गई हों, लेकिन अभी भी उनकी जली हुई रस्सी में इतना बल है कि वह किसी दूसरी विपक्षी पार्टी के लिए प्रदेश में किसी तरह का स्पेस नहीं देना चाहतीं। उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव भी यही चाहते हैं। बिहार में तेजस्वी यादव की भी यही सोच है, तो फिर विपक्षी गठबंधन बनेगा कैसे? आखिर इस एकता के लिए अलग-अलग जगहों पर अलग-अलग विपक्षी पार्टियों को एक-दूसरे के साथ समझौता तो करना ही पड़ेगा।
भाजपा का इसीलिए तेजी से विस्तार हुआ है, क्योंकि उसने गठबंधन में अपने सहयोगियों को चाहे उनकी कितनी भी कम ताकत हो, बंटवारे का ठीकठाक हिस्सा दिया है। तभी उसका गठबंधन एकजुट होकर उसके साथ खड़ा है। लेकिन विपक्षी खेमे में कोई भी पार्टी एकता के लिए अपनी राजनीति की कुर्बानी नहीं देना चाहती।
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विपक्षी एकता के हिमायती राजनेता चाहते हैं कि नेतृत्व भी उसका रहे, सीटें भी उसकी शर्तों पर तय हो, एजेंडा भी वही तय करे और दूसरे दल केवल समर्थन करें। ऐसे में तो गठबंधन नहीं होने वाला और तकनीकी रूप से हो भी गया तो उसका विपक्ष को कोई फायदा होने वाला नहीं है। विपक्ष की सबसे बड़ी चुनौती यह भी है कि इनका आपस में किसी के साथ भरोसा नहीं है।
विपक्षी एकता सबसे बड़ी चुनौती..
दिल्ली में विपक्षी नेताओं की एकता बैठक तो हुई, लेकिन इसका नतीजा बैठक शुरू होने के पहले ही तय था। भाजपा को हराने के लिए ये विपक्षी पार्टियां एक गठबंधन तो बनाना चाहती हैं, लेकिन ये चाहती हैं कि उन्हें इस गठबंधन के लिए खुद कोई कुर्बानी न देनी पड़े, पर हां, दूसरे की कुर्बानी पर यह जरूर सत्ता सुख भोग सकें। इसलिए गठबंधन की बैठक में आम आदमी पार्टी ने हिस्सा नहीं लिया। डीएमके ने साफ मना कर दिया कि कांग्रेस के नेतृत्व वाले गठबंधन में उसे शामिल होने की कोई जरूरत नहीं है।
लेख-विजय कपूर के द्वारा
