महंगाई का बढ़ता प्रभाव, सोने के सनसनाते भाव
त्योहारों और वेडिंग सीजन से पहले सोने के भाव आसमान छूने लगे हैं। अभी दशहरा और दिवाली के मौके पर इसमें और तेज़ी देखी जाएगी। सोने के तेज़ी से बढ़ते दामों की वजह से 'पड़ोसी' ठीक से सो नहीं पा रहे हैं। यह बात उन्होंने 'निशानेबाज' को बताई फिर 'निशानेबाज' ने जो तर्क दिए हैं वो आप भी पढ़िए और आनंद लीजिए
- Written By: मृणाल पाठक
(डिजाइन फोटो)
पड़ोसी ने हमसे कहा, ‘‘निशानेबाज, सोने के भाव शिखर पर जा रहे हैं। दशहरा-दिवाली में तो और भी ज्यादा तेजी देखी जाएगी। सोने के बढ़ते दाम की वजह से हम ठीक से सो भी नहीं पाते।’’
हमने कहा, ‘‘आपका भी जवाब नहीं। सब्जी महंगी होती है तो फिक्र करते हैं और सोना महंगा होता है तो दुबले होते हैं! आपको रोज-रोज कौनसा सोना खरीदना है। होने दीजिए महंगा!’’
पड़ोसी ने कहा, ‘‘निशानेबाज, हमारा देश पहले सोने की चिड़िया कहलाता था। क्या वह चिड़िया उड़ गई? बताइए किस डाल पर जा बैठी है?’’
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हमने कहा, ‘‘आप सोना खरीदने की बजाय उसकी चर्चा या गुणगान कर सकते हैं। ज्वेलर्स के शोरूम के सामने से 10 बार गुजर सकते हैं। उसमें आपका एक भी पैसा खर्च नहीं होता। किसी की तारीफ करते हुए सोने पे सुहागा जैसा मुहावरा उपयोग में ला सकते हैं। किसी पीलिया के मरीज को दिलासा देते हुए कह सकते हैं कि तुम्हारा रंग सोने जैसा पीला हो गया है। जब गाने की इच्छा हो तो ‘सोने जैसा रंग है तेरा, चांदी जैसे बाल’ गुनगुनाइए।’’
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पड़ोसी ने कहा, ‘‘निशानेबाज, आप हमें यूं ही बहला रहे हैं। कुछ माह बाद शादी-ब्याह का सीजन शुरू होगा। सोना महंगा होता चला गया तो लोग कैसे खरीदेंगे?’’
हमने कहा, ‘‘लोगों को समझाइए कि सोने की बजाय हीरा खरीदें। वह रखते समय कम जगह घेरता है। लोग सोना खरीदता है और लाकर में रख देते हैं जिसका किराया देना पड़ता है। वैसे भी सोना मुसीबत की जड़ है। रामायण में सीता हरण स्वर्ण मृग की वजह से हुआ था। रावण की सोने की लंका तहस-नहस हो गई थी। ग्रीक लोक कथा में राजा मिडास का किस्सा मशहूर है। उस राजा ने ईश्वर से वरदान मांगा था कि जिस वस्तु को वह स्पर्श करेगा, वह सोने की बन जाएगी। उसके छूते ही खाने-पीने की वस्तुएं सोने की बन गई। इसलिए उसे भूखा रह जाना पड़ा। अपनी बेटी को उसने प्यार से हाथ लगाया तो वह भी सोने की पुतली बन गई। इसलिए सोने के मोह से दूर रहना ही अच्छा। आप तो भजन गाइए- ना मांगूं मैं सोना-चांदी, मांगूं दर्शन देवी तेरे द्वार खड़ा एक जोगी!’’
लेख- चंद्रमोहन द्विवेदी द्वारा
