

IIT Students Academic Pressure: पिछले कुछ महीनों में आईआईटी बॉम्बे के 4 छात्रों की खुदकुशी और 2023 से लेकर अब तक आईआईटी दिल्ली के 8 विद्यार्थियों की आत्महत्या की क्या वजह हो सकती है? शैक्षणिक दबाव, परीक्षा में अनुत्तीर्ण होना, जातिवाद तथा अवसाद जैसे कारण सामने आए हैं। कुछ मामलों में फैकल्टी व प्रबंधन को ऐसी त्रासदी के लिए जबाबदार माना गया है। वैसे किसी आत्महत्या के लिए आंतरिक जांच के नतीजे आए बिना प्राध्यापकों व अधिकारियों को दोषी ठहराना उचित नहीं है।
इसमें शक नहीं कि आईआईटी में बहुत ऊंचा शैक्षणिक स्तर है जो कि उनकी विशेषता माना जाता है। छात्रों को एकाग्रता से काफी पढ़ाई और मेहनत भी करनी पड़ती है। इसलिए उन्हें काउंसलिंग, सलाह व परामर्श देने की भी आवश्यकता है। यह भी देखना होगा कि आईआईटी में कौन सी दिक्कतें हैं? वहां शिक्षक और विद्यार्थियों के बीच 1:10 का अनुपात होना चाहिए, ऐसा नहीं हो पा रहा है। छात्रों की तादाद बढ़ रही है लेकिन फैकल्टी का विस्तार नहीं हो रहा है।
देश के 23 आईआईटी में छात्रों की संख्या एक दशक में 65,000 से बढ़कर 1.35 लाख हो गई है। यदि शिक्षकों की तादाद पर्याप्त हो तो छात्रों की दिक्कतों का उचित तरीके से निराकरण किया जा सकता है। कहm सकते हैं कि आईआईटी में स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसेस जैसे कि जांच ऑपरेटिंग प्रोसेस जैसे कि जांच समिति, शिकायत निवारण केंद्र मौजूद हैं लेकिन उनका सार्थक उपयोग भी तो होना चाहिए, आईआईटी दिल्ली में एक बाहरी जांच समिति गठित की गई है।
आईआईटी बॉम्बे के निदेशक ने कहा कि एक समिति आत्महत्या के मामलों तथा छात्रों के प्रतिनिधित्व संबंधी चिंताओं पर विचार करेगी। यह देखना होगा कि शिकायत निवारण प्रणाली, मूल्यांकन पद्धति, छात्रावास आदि की व्यवस्था में कौन सा सुधार जरूरी है। छात्रों के मानसिक तनाव की भी प्रशिक्षित विशेषज्ञों द्वारा जांच की जानी चाहिए।
छात्रों की समस्या शैक्षणिक ओवरलोड, भेदभाव, गैरजिम्मेदार प्रशासन तथा छात्रावास संबंधी दिक्कतों से जुड़ी हो सकती है। क्या कैम्पस में कोई छात्र अपने सुपरवाइजर से असहमत हो सकता है? उसे दिए गए ग्रेड पर सवाल उठा सकता है? क्या ग्रेडिंग प्रणाली को पारदर्शी बनाया जा सकता है? क्या किसी पिछड़े वर्ग के छात्र के साथ भेदभाव या अपमान को टाला नहीं जा सकता ? आईआईटी बॉम्बे ने छात्र साहिल वाकोडे की मौत के मामले में प्रोफेसर सूर्यनारायण दुल्ला को डीन पद से हटा दिया।
उन पर छात्र के मानसिक उत्पीड़न का आरोप था। मनमाना दंड, अवसरों से वंचित रखना जैसी बातें नहीं होनी चाहिए। न तो छात्र हर समय सही होते हैं और न फैकल्टी हर समय गलत होती है। छात्रों की देखभाल और मानसिक स्वास्थ्य को पर्याप्त महत्व दिया जाना चाहिए। यह स्वीकार किया जाए कि दृष्टिकोण में मतभेद होना गलत नहीं है। चर्चा के माध्यम से समस्याओं व प्रश्नों का हल निकाला जा सकता है।
लेख- चंद्रमोहन द्विवेदी द्वारा