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संपादकीय: मुफ्त की सौगात से विकास पर आंच, लालच की रेवड़ियां कितनी सही

Free schemes impact: आरोप है कि वर्ल्ड बैंक से मिली कर्ज की रकम को बिहार की एनडीए सरकार ने चुनाव प्रचार अभियान के दौरान राज्य की 1 करोड़ 20 लाख महिलाओं के हवाले कर दिया।

  • By दीपिका पाल
Updated On: Nov 29, 2025 | 12:08 PM

मुफ्त की सौगात से विकास पर आंच (सौ. डिजाइन फोटो)

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नवभारत डिजिटल डेस्क: चुनाव जीतने के लिए मतदाताओं को मुफ्त की सौगात देने का जो खतरनाक सिलसिला चल पड़ा है, वह विकास को अवरुद्ध कर अर्थव्यवस्था को कर्ज में डुबो देगा। इस खतरे की अनदेखी करते हुए चुनावी लाभ उठाने या सत्ता हासिल करने के लालच में रेवड़ियां बांटी जाती हैं। आरोप है कि वर्ल्ड बैंक से मिली कर्ज की रकम को बिहार की एनडीए सरकार ने चुनाव प्रचार अभियान के दौरान राज्य की 1 करोड़ 20 लाख महिलाओं के हवाले कर दिया। हर महिला के खाते में 10,000 रुपए जमा कर दिए गए।

नीतीश कुमार की जदयू व बीजेपी को इसका लाभ चुनावी जीत के रूप में मिला। वैसे वादा तो राजद और कांग्रेस के महागठबंधन ने भी किया था कि चुनाव जीतने पर हर महिला को 30,000 रुपए देंगे और हर परिवार के एक सदस्य को सरकारी नौकरी दी जाएगी लेकिन इसका असर नहीं पड़ा। आगे का भरोसा कौन करे? आज नगद कल उधार! सत्ता में होने की वजह से एनडीए के लिए महिलाओं के खाते में तुरंत रकम जमा कर देना आसान था। पक्ष हो या विपक्ष, प्राय: हर राज्य में मतदाताओं के लुभाने के लिए धन या गिफ्ट बांटने लगे हैं। कोई नहीं देखता कि ऐसा करने से आदर्श आचार संहिता का उल्लंघन हो रहा है।

चुनाव कार्यक्रम घोषित होने के बाद तो ऐसा बिल्कुल नहीं होना चाहिए। जिस देश में करोड़ों लोग मुश्किल से जीवनयापन कर रहे हैं, वहां उनके खाते में रकम का हस्तांतरण उनके स्वतंत्र निर्णय को प्रभावित करता है। वह इस रकम से न तो कोई छोटा-मोटा उद्योग शुरू करते हैं न उसका कहीं निवेश करते हैं, बल्कि खर्च कर डालते हैं और कुछ ही दिनों में उनकी हालत फिर से जस की तस हो जाती है। यदि यह रकम विकास योजनाओं में लगाई जाए तो बेरोजगार लोगों को वहां काम मिल सकता है। किसी को मुफ्तखोर बनाने की बजाय उसे मेहनत की कमाई करना सिखाया जाना चाहिए।

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वंचितों व गरीबों को राहत देने के लिए कल्याणकारी कदम उठाना सही है लेकिन यह बात चुनाव के समय ही क्यों सूझती है? वोट पर नजर रखते हुए रेवड़ी बांटकर एक तरह से मतदाताओं को रिश्वत दी जाती है। चुनाव जीतने के बाद 5 वर्ष तक ऐसी कोई दरियादिली नहीं दिखाई जाती। विपक्ष इस तरह की मुफ्तखोरी की आलोचना नहीं करता क्योंकि ऐसा करने पर उसे गरीब विरोधी करार दिया जा सकता है। इस तरह मुफ्त में रकम बांटने से राज्य पर कर्ज का बोझ बढ़ जाता है आंध्रप्रदेश और तेलंगाना की सरकार इसे महसूस कर रही हैं कि चुनावी वादे पूरे करने से सरकारी खजाने पर कितना भार आता है। महाराष्ट्र व कर्नाटक की सरकारों को भी यह पता चल गया है कि उनके पास ऐच्छिक खर्च करने के लिए रकम ही नहीं बचती। बिहार में तो एनडीए ने एक बार में हर महिला को 10,000 देकर छुट्टी पा ली लेकिन जहां हर माह रकम देते रहने का वादा पूरा किया जा रहा है, वहां सरकार पर दबाव बढ़ जाता है। मुद्दा यह है कि राज्यों में वित्तीय अनुशासन कायम रखने के लिए कैग क्या कर रहा है?

लेख-चंद्रमोहन द्विवेदी के द्वारा

How much development is possible by giving freebies to voters to win elections

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Published On: Nov 29, 2025 | 12:08 PM

Topics:  

  • Bihar Assembly Election 2025
  • Nitish Kumar
  • RJD
  • Special Coverage

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