Parental Consent Marriage Law ( सोर्स: सोशल मीडिया )
Parental Consent Marriage Law: गुजरात की भूपेंद्र पटेल सरकार लव जिहाद को रोकने के उद्देश्य से विवाह के पंजीयन में माता-पिता या अभिभावकों की सहमति अनिवार्य करने जा रही है। इसके लिए गुजरात विवाह पंजीयन कानून 2006 में संशोधन किया जाएगा। यह कदम लड़कियों व सनातन धर्म की गरिमा सुरक्षित रखने के नाम पर उठाया गया है।
यहां प्रश्न उठता है कि वयस्क हो चुके युवाओं के अपने मर्जी व पसंद से विवाह करने में हस्तक्षेप क्यों होना चाहिए? कानून और संविधान ने उन्हें अपने जीवनसाथी के चयन का अधिकार दे रखा है, क्या गुजरात सरकार का कदम उनकी आजादी पर बंधन नहीं लगाला? एक ओर तो प्रधानमंत्री मोदी गाहे-बगाहे नारी शक्ति का गुणगान करते हैं तथा उनकी सरकार ‘सबका साथ, सबका विकास और सबका विश्वास’ का दावा करती है, वहीं गुजरात में विवाह के रजिस्ट्रेशन में पालकों की सहमति अनिवार्य की गई है।
यह व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर बंधन है। वर्तमान समय में विवाह का पंजीयन इसलिए महत्व रखता है क्योंकि इससे वैवाहिक संबंधों को कानूनी वैधता मिलती है तथा पासपोर्ट बनवाने, उत्तराधिकार तय करने तथा अन्य दस्तावेज बनवाने में मदद मिलती है अन्यथा इसे लिव-इन जैसा माना जा सकता है। तलाक भी लेना हो तो विवाह की वैधता सिद्ध करनी होती है।
इसके लिए मैरिज रजिस्ट्रेशन सर्टिफिकेट का होना जरूरी है। गुजरात विधानसभा में उप मुख्यमंत्री हर्ष संघवी ने प्रस्तावित संशोधन की आवश्यकता पर जोर देते हुए कहा कि कुछ घटक वर्तमान प्रक्रिया का दुरुपयोग कर रहे हैं। मासूम लड़कियों को बहला-फुसला कर विवाह पंजीयन करने की शिकायतें बढ़ती जा रही हैं।
अन्य धर्म के युवक अपना बनावटी हिंदू नाम रखकर धोखाधड़ी से हिंदू लड़कियों से शादी कर रहे हैं। उनकी असलियत शादी के बाद सामने आती है। लव जिहाद के जरिए धमर्मांतरण कराया जाता है। समाज और संगठनों की ओर से मांग की जा रही है कि विवाह पंजीयन कानून सख्त किए जाएं तथा वर-वधु का विवाह के संबंध में अपने पालकों को सूचित कर उनकी मंजूरी लेना आवश्यक रहेगा।
रजिस्ट्रेशन के आवेदन के साथ पालकों के नाम, पता व संपर्क का विवरण देना अनिवार्य होगा। यूपी और मध्य प्रदेश में धर्मातरण विरोधी कानून बने हैं। उत्तराखंड के समान नागरिक कानून के तहत लिव-इन में रहने वाले जोड़ों को पंजीयन कराना अनिवार्य हो गया है।
दूसरी ओर लता सिंह बनाम उत्तर प्रदेश सरकार, लक्ष्मीबाई चंदारगी विरुद्ध कर्नाटक राज्य जैसे मामलों में टिप्पणी की गई है कि वयस्कों के विवाह संबंधी निर्णय में परिवार या समुदाय बाधक नहीं बन सकते।
संविधान का अनुच्छेद 21 उन्हें जीवन की सुरक्षा और व्यक्तिगत आजादी प्रदान करता है। इसलिए गुजरात सरकार का प्रस्ताव संवैधानिक कसौटी पर टिक नहीं पाएगा। यह बात अलग है कि गुजरात के पाटीदार व अन्य समुदायों ने विवाह पंजीयन में पालकों की सहमति अनिवार्य करने की पुरजोर मांग की है।
लेख- चंद्रमोहन द्विवेदी के द्वारा