नवभारत संपादकीय: किसानों को अधिकतम राहत की आवश्यकता, कृषि नीति पर पुनर्विचार की मांग
Farmer Loan Waiver: कर्जमाफी के बावजूद किसानों की आत्महत्या नहीं थमने पर कृषि नीति पर सवाल उठ रहे हैं। बढ़ती लागत, महंगाई और सीमित राहत से किसान परिवारों की चिंता बढ़ी है।
- Written By: अंकिता पटेल
किसान आत्महत्या, कर्जमाफी, कृषि नीति, (सोर्स: सोशल मीडिया)
Farmer Suicide Crisis India: विगत दशकों में अनेक बार कर्जमाफी करने के बावजूद किसानों की आत्महत्या नहीं रुक पाई। इसका अर्थ यह है कि इस तरह की मलहम-पट्टी से कुछ नहीं होने वाला। सरकार को अपनी कृषि नीति पर पुनर्विचार करना चाहिए ताकि किसानों को राहत मिले। 2001 में तय किया गया था कि आत्महत्या करने वाले किसान के परिजनों को 1 लाख रुपए आर्थिक सहायता दी जाएगी। तब से 25 वर्ष बीत गए लेकिन आज भी वह रकम 1 लाख से ज्यादा नहीं बढ़ाई गई।
इतने वर्षों में महंगाई बहुत बढ़ गई और रुपए का मूल्य भी काफी कम हो गया। बीज, खाद, डीजल सभी के दाम अत्यधिक बढ़ गए, खेती के उत्पादन खर्च में भारी वृद्धि हो गई। सरकारी कर्मचारियों के वेतन में इन 25 वर्षों में बहुत बढ़ोतरी हो गई, लेकिन किसान के परिवार की किसी को फिक्र नहीं है। पूर्व प्रधानमंत्री स्व. लालबहादुर शास्त्री ने ‘जय जवान जय किसान’ का नारा दिया था।
उसी नारे को दोहराते हुए स्व। अटलबिहारी वाजपेयी ने उसमें जय विज्ञान’ जोड़ दिया। इतना होने पर भी अन्नदाता किसान सरकार की प्राथमिकता में नहीं आता। यद्यपि मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने 2 लाख रुपए तक फसल कर्ज माफ करने की घोषणा की है, लेकिन सरकारी मशीनरी की उदासीनता व लापरवाही तथा बैंकों की कड़ी शर्तों की वजह से किसानों को राहत मिलना कठिन जा रहा है। एक ओर तो कृषि की लागत अंधाधुंध बढ़ गई है। अच्छे बीज व रासायनिक खाद के दाम बहुत ऊपर चले गए हैं।
सम्बंधित ख़बरें
नवभारत विशेष: अकेले पड़ते ट्रंप को याद आए प्रधानमंत्री मोदी, जरूरत पड़ने पर मदद का ऑफर दिया
Navabharat Nishanebaaz: राम ने धोए थे निषादराज के पैर ! अमित शाह का कथन बेसिर-पैर
नागपुर में बन रहा अंतरराष्ट्रीय किसान हब, तकनीक से जुड़ेगा किसान; समय से पहले तैयार हो सकता है कन्वेंशन सेंटर
25 मई का इतिहास: शहजादे सलीम और मेहरून्निसा के निकाह का दिन, ऐतिहासिक कहानी
बढ़ती लागत और कर्ज के बोझ से किसान बेहाल
ट्रैक्टर का किराया बढ़ा है, साथ ही डीजल के लिए लंबी कतार देखी जा रही है। डीजल मिलेगा तभी तो ट्रैक्टर चलेगा। अच्छे बैल की कीमत भी 1 लाख रुपए तक पहुंच गई है। कृषि कार्य के लिए मजदूरी भी बहुत महंगी हो चुकी है। दूसरी ओर प्रकृति के प्रकोप, कर्ज का बोझ, साहूकारों के तकाजे, बैंकों का दबाव किसान का धैर्य तोड़ देते हैं। इतनी लागत और कड़ी मेहनत के बाद भी जब फसल के उचित दाम नहीं मिलते, तो किसान अत्यंत लाचार हो जाता है। प्याज के भाव बुरी तरह गिरे हैं।
उद्योगपतियों के बड़े कर्ज राइट ऑफ कर दिए जाते हैं। सरकारी कर्मचारियों को पे कमीशन का लाभ देने के अलावा समय-समय पर भत्ते बढ़ाए जाते हैं। लेकिन किसान के माथे पर बदनसीबी लिखी होती है। किसान की खुदकुशी के बाद भी परिजनों को सिद्ध करना पड़ता है कि फसल नहीं हुई, कर्ज का बोझ बढ़ गया। इसके अलावा पुलिस पंचनामा, सात-बारा का दस्तावेज, राष्ट्रीयकृत बैंक का कर्ज होने का प्रमाण पेश करना पड़ता है।
यह भी पढ़ें:-नवभारत विशेष: अकेले पड़ते ट्रंप को याद आए प्रधानमंत्री मोदी, जरूरत पड़ने पर मदद का ऑफर दिया
विदेश में किसानों को भारी सब्सिडी के साथ पूरा संरक्षण दिया जाता है ताकि वह खेती करना छोड़कर शहर में रहने न आ जाएं, हमारे यहां कितने ही किसान हालात से तंग आकर खेती करना छोड़ने लगे हैं क्योंकि वह घाटे का सौदा बनती चली जा रही है, सिर्फ बड़ी जोत वाले गिने-चुने धनवान किसान मजे में हैं जो उद्योग के समान कृषि में पैसा लगाते हैं। उन्हीं के लिए खेती फायदेमंद है।
लेख- चंद्रमोहन द्विवेदी के द्वारा
