Explainer: क्या वाकई ग्रीन हैं ग्रीन क्रैकर्स, प्रदूषण, सेहत और जेब पर कितना असर? आसान भाषा में समझें

Green Cracker Explainer: दीवाली पर प्रदूषण से निपटने के लिए आए 'ग्रीन क्रैकर्स' को पर्यावरण-अनुकूल माना जाता है, लेकिन ग्रीन पटाखें को लेकर कई सवाल भी हैं। आइए इसे विस्तार से समझते हैं।
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क्या होते हैं ग्रीन पटाखें?(सोर्स- AI जेनरेटेड इमेज)
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Highlights:

  • दिवाली आते ही देश भर में जहरीली धुंध और आबोहवा के बिगड़ने का खतरा बढ़ जाता है।

  • सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में पारंपरिक पटाखों पर पाबंदी लगाने के बाद 'ग्रीन क्रैकर्स' को मंजूरी दी थी।

  • हालांकि, हालिया शोध और जमीनी रिपोर्ट्स के अनुसार, ग्रीन पटाखे पूरी तरह से प्रदूषण मुक्त नहीं हैं।

What is Green Cracker Explained: ग्रीन पटाखे हवा का प्रदूषण कम करने के लिए होते हैं। लेकिन दिल्ली में दिवाली के दौरान हुई रिसर्च में पाया गया कि वे आम पटाखों की तुलना में ज्यादा अल्ट्राफाइन पार्टिकल्स छोड़ सकते हैं, जिससे यह दावा मुश्किल हो जाता है कि वे असल में कितने साफ हैं।

दिल्ली टेक्नोलॉजिकल यूनिवर्सिटी (DTU) के रिसर्चर्स की 2022 की एक स्टडी में पाया गया कि ग्रीन पटाखों के लिए अल्ट्राफाइन पार्टिकल्स और टोटल पार्टिकल्स का अनुपात 0.72 था, जबकि आम पटाखों के लिए यह 0.6 से भी कम था।

ग्रीन पटाखे को लेकर अहम सवाल

हालांकि, इन नतीजों से यह साबित नहीं होता कि सभी ग्रीन पटाखे ज्यादा प्रदूषण फैलाते हैं, लेकिन यहां एक सवाल उठना लाजिमी है कि उनके प्रर्यावरण पर असर को कैसे मापा जाता है और उनके सर्टिफिकेशन स्टैंडर्ड असल में क्या गारंटी देते हैं।

काउंसिल ऑफ साइंटिफिक एंड इंडस्ट्रियल रिसर्च (CSIR) ने ग्रीन क्रैकर्स बनाए हैं, जिसमें नेशनल एनवायर्नमेंटल इंजीनियरिंग रिसर्च इंस्टीट्यूट (NEERI) की अहम भूमिका है।

ग्रीन क्रैकर्स में बदले हुए केमिकल फॉर्मूलेशन और बनाने की तकनीक का इस्तेमाल होता है, जिसका मकसद एमिशन कम करना है। लेकिन वे असल में कितना प्रदूषण रोकते हैं, और उनसे निकलने वाले पार्टिकल्स के बारे में रिसर्च क्या कहती है? आइए सबकुछ विस्तार से जानते हैं।

ग्रीन क्रैकर्स असल में क्या हैं?

ग्रीन क्रैकर्स ऐसे पटाखे हैं जिन्हें जलने के दौरान निकलने वाले पॉल्यूटेंट को कम करने के लिए बनाया गया है। इनमें मॉडिफाइड केमिकल फॉर्मूलेशन, कुछ खास रॉ मटीरियल की कम मात्रा और एडिटिव्स का इस्तेमाल किया जाता है, जिनका मकसद जलने की क्षमता को बेहतर बनाना या पार्टिकुलेट एमिशन को कम करना है।

पारंपरिक पटाखों से, जो काफी मात्रा में कण, सल्फर डाइऑक्साइड (SO₂), नाइट्रोजन ऑक्साइड (NOx) और मेटल निकाल सकते हैं, अलग ग्रीन क्रैकर्स खास पॉल्यूटेंट का कम एमिशन करने के लिए डिजाइन किए गए हैं, जबकि उनका साउंड और विज़ुअल इफेक्ट बना रहता है।

ग्रीन पटाखे कैसे तैयार किए जाते हैं?

CSIR-NEERI के अनुसार, ग्रीन क्रैकर्स मॉडिफाइड केमिकल फॉर्मूलेशन का इस्तेमाल करके बनाए जाते हैं और उन्हें उसी कैटेगरी के पारंपरिक पटाखों के मुकाबले आंका जाता है। इंस्टीट्यूट के मौजूदा एमिशन क्राइटेरिया के अनुसार पार्टिकुलेट मैटर एमिशन में कम से कम 30 फीसदी की कमी होनी चाहिए।

इसके अलावा, कोई प्रोडक्ट पार्टिकुलेट मैटर में कम से कम 20 प्रतिशत की कमी के साथ-साथ गैस एमिशन में कम से कम 10 फीसदी की कमी करके क्वालिफाई कर सकता है।

क्या पॉल्यूशन फ्री हैं ग्रीन पटाखे?

CSIR-NEERI एक खास एमिशन-टेस्टिंग फैसिलिटी में पटाखों को टेस्ट करता है, जिसमें उसी प्रोडक्ट कैटेगरी के पारंपरिक फॉर्मूलेशन के मुकाबले कण और गैस एमिशन को मापा जाता है। टेस्टिंग प्रोसेस के हिस्से के तौर पर प्रोडक्ट्स को शोर और बैन केमिकल्स के लिए भी जांचा जाता है।

इन क्राइटेरिया का मतलब यह नहीं है कि ग्रीन पटाखे पॉल्यूशन-फ्री हैं। वे अभी भी धुआं और कण छोड़ते हैं, और एमिशन में कमी की हद हर प्रोडक्ट में अलग-अलग होती है।

ग्रीन क्रैकर्स किसने और क्यों बनाए?

अर्जुन गोपाल बनाम यूनियन ऑफ इंडिया मामले में सुप्रीम कोर्ट के 23 अक्टूबर, 2018 के आदेश ने पारंपरिक पटाखों को बनाने, बेचने और इस्तेमाल करने पर रोक लगा दी और कुछ शर्तों के साथ कम प्रदूषण वाले दूसरे पटाखों के इस्तेमाल की इजाजत दी। इसके बाद कोर्ट ने 31 अक्टूबर को अपने निर्देशों को साफ किया, जिसमें पटाखे बनाने में बेरियम सॉल्ट पर रोक भी शामिल थी।

इस दखल के बाद मिनिस्ट्री ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी ने 29 अक्टूबर, 2018 को घोषणा की कि CSIR के वैज्ञानिकों ने कम उत्सर्जन वाले पटाखों की तीन कैटेगरी बनाई हैं-

  • SWAS

  • STAR

  • SAFAL

इस पहल में कई साइंटिफिक इंस्टीट्यूशन शामिल थे, जिनमें CSIR-NEERI, सेंट्रल इलेक्ट्रॉनिक्स इंजीनियरिंग रिसर्च इंस्टिट्यूट (CEERI), इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ टॉक्सिकोलॉजी रिसर्च (IITR), इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ़ केमिकल टेक्नोलॉजी (IICT), नेशनल केमिकल लेबोरेटरी (NCL), सेंट्रल इलेक्ट्रोकेमिकल रिसर्च इंस्टिट्यूट (CECRI), नेशनल बॉटैनिकल रिसर्च इंस्टिट्यूट (NBRI) और सेंट्रल मैकेनिकल इंजीनियरिंग रिसर्च इंस्टिट्यूट (CMERI) शामिल हैं।

CSIR-NEERI ने डेवलपमेंट और टेस्टिंग एक्सरसाइज को कोऑर्डिनेट किया और अब यह ग्रीन क्रैकर्स पर टेस्टिंग और रिसर्च के लिए नेशनल नोडल सेंटर है।

ग्रीन क्रैकर्स को अक्टूबर 2019 में आधिकारिक तौर पर लॉन्च किया गया था। इसके साथ ही ग्राहकों को मंजूर उत्पाद की पहचान करने में मदद करने के लिए एक ग्रीन लोगो और QR-कोड सिस्टम भी दिया गया था।

ग्रीन पटाखे आम पटाखों से अलग कैसे?

मुख्य अंतर उनकी केमिकल बनावट में है। आम पटाखे धमाके, रंग और आवाज पैदा करने के लिए अलग-अलग ऑक्सीडाइजर, फ्यूल और कंपाउंड का इस्तेमाल करते हैं। पटाखे के टाइप के आधार पर उनके जलने से कण, सल्फर डाइऑक्साइड, नाइट्रोजन ऑक्साइड और बेरियम जैसे मेटल निकल सकते हैं।

ग्रीन क्रैकर्स कुछ केमिकल का इस्तेमाल कम करने और जलने की क्षमता को बेहतर बनाने के लिए बदले हुए फॉर्मूलेशन का इस्तेमाल करते हैं। CSIR-NEERI ने तीन मुख्य कैटेगरी बनाई हैं-

SWAS (सेफ वॉटर रिलीजर)

CSIR-NEERI के मौजूदा टेक्निकल डिस्क्रप्शन में कहा गया है कि SWAS फोड़ने के दौरान पार्टिकुलेट मैटर को पकड़ने के लिए एक पॉलीमर हाइड्रोजेल का इस्तेमाल करता है। मिनिस्ट्री की 2018 की घोषणा में अलग से पानी की भाप और/या हवा के निकलने को धूल दबाने वाले और गैसीय एमिशन के लिए पतला करने वाले के तौर पर बताया गया था।

STAR (सेफ थर्माइट क्रैकर)

यह फॉर्मूलेशन जलने की क्षमता को बेहतर बनाने के लिए आयरन ऑक्साइड का इस्तेमाल करता है। CSIR-NEERI के टेक्निकल डॉक्यूमेंट में फॉर्मूलेशन में लगभग 40 परसेंट आयरन ऑक्साइड बताया गया है। इस एडिटिव का मकसद जलने की प्रक्रिया को बेहतर बनाना और एमिशन को कम करना है।

SAFAL (सेफ मिनिमल एल्युमिनियम)

यह फॉर्मूलेशन एल्युमिनियम की जरूरी मात्रा को कम करने के लिए जीओलाइट-बेस्ड मटीरियल का इस्तेमाल करता है। खासकर रिएक्शन शुरू करने के लिए एल्युमिनियम को कम मात्रा में रखा जाता है।

क्या ग्रीन पटाखे सच में कम प्रदूषण करते हैं?

जर्नल ऑफ एनवायर्नमेंटल मैनेजमेंट में छपी एक स्टडी में दिल्ली टेक्नोलॉजिकल यूनिवर्सिटी के कैंपस में दिवाली 2019 के दौरान पार्टिकल एमिशन की जांच की गई। रिसर्चर्स ने पार्टिकल नंबर कंसंट्रेशन और पार्टिकल-साइज डिस्ट्रीब्यूशन को मॉनिटर किया, यह मापा कि हवा में कितने पार्टिकल मौजूद थे और वे कितने बड़े या छोटे थे।

उन्होंने दिवाली पर शाम 6 बजे से 10 बजे के बीच लगभग 1.29 लाख पार्टिकल प्रति क्यूबिक सेंटीमीटर का औसत पार्टिकल नंबर कंसंट्रेशन रिकॉर्ड किया। शाम 7.30 बजे के आसपास यह कंसंट्रेशन लगभग 1.7 लाख पार्टिकल प्रति क्यूबिक सेंटीमीटर तक पहुंच गया।

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स्टडी में ग्रीन पटाखों के लिए 0.72 का अल्ट्राफाइन-पार्टिकल-टू-टोटल-पार्टिकल रेश्यो बताया गया, जबकि पारंपरिक पटाखों के लिए यह आंकड़ा 0.6 से कम बताया गया। रिसर्चर्स ने देखा कि ग्रीन पटाखे पारंपरिक पटाखों की तुलना में छोटे डायमीटर वाले ज्यादा पार्टिकल निकालते हैं।

ग्रीन पटाखे खास एमिशन को कम करने के लिए डिजाइन किए गए हैं, प्रदूषण को खत्म करने के लिए नहीं। उनका असर उनके केमिकल कंपोजिशन, पार्टिकल एमिशन और निकलने वाले पार्टिकल्स के साइज और संख्या पर निर्भर करता है।

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क्या पारंपरिक पटाखे से महंगा है ग्रीन पटाखा?

हां, आमतौर पर ग्रीन पटाखे पारंपरिक (नॉर्मल) पटाखों की तुलना में महंगे होते हैं। इनके निर्माण की विशेष तकनीक और सामग्री के कारण इनकी कीमत सामान्य पटाखों के मुकाबले थोड़ी अधिक होती है। कुछ विशेष बाजारों या मांग में अचानक वृद्धि होने पर इनकी कीमतों में 10 से 20% तक का मामूली अंतर देखने को मिल सकता है, लेकिन यह कोई बहुत बड़ा अंतर नहीं है।