

Highlights:
भारतीय शेयर बाजार आज दुनिया की अर्थव्यवस्थाओं से बहुत गहराई से जुड़ा हुआ है।
अमेरिका दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है और US डॉलर दुनिया की प्रमुख करेंसी।
US Fed जब ब्याज दरों में फेरबदल करता है, तो उसका असर पूरी दुनिया पर पड़ता है।
US Interest Rates Impact on Indian Stock: भारतीय शेयर बाजार आज के समय में दुनिया भर की अर्थव्यवस्थाओं से बहुत गहराई से जुड़ा हुआ है। अक्सर आपने खबरों में सुना होगा कि अमेरिका के केंद्रीय बैंक यानी 'फेडरल रिजर्व' (US Federal Reserve) ने ब्याज दरों में बदलाव कर दिया है और अगले ही दिन दलाल स्ट्रीट (Sensex-Nifty) पर भारी उतार-चढ़ाव देखने को मिला।
मन में यह सवाल आना लाजिमी है कि अमेरिका में घटने या बढ़ने वाली ब्याज दरों का सीधा असर भारत में बैठे निवेशकों और शेयर बाजार पर क्यों और कैसे पड़ता है? आइए इस एक्सप्लेनर में इस पूरी वैश्विक आर्थिक प्रक्रिया को आसान भाषा में समझते हैं।
अमेरिका दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है और अमेरिकी डॉलर दुनिया की प्रमुख रिजर्व करेंसी है। अमेरिकी फेडरल रिजर्व (US Fed) जब भी ब्याज दरों में फेरबदल करता है, तो उसका असर केवल अमेरिका पर नहीं बल्कि पूरी दुनिया के वित्तीय बाजारों पर पड़ता है। फेड जब दरें घटाता या बढ़ाता है, तो दुनिया भर के निवेशक अपनी निवेश रणनीतियां उसी के अनुसार बदलते हैं।
जब अमेरिकी फेडरल रिजर्व महंगाई को कंट्रोल करने के लिए ब्याज दरें बढ़ाता है, तो इसका असर भारत जैसे उभरते बाजारों पर कई तरह से पड़ता है।
विदेशी निवेशकों की निकासी
सबसे पहले विदेशी निवेशकों की निकासी इसमें से एक है। अमेरिका में ब्याज दरें बढ़ने का मतलब है कि वहां के बैंकों और सरकारी बॉन्ड में निवेश करने पर बिना किसी बड़े जोखिम के सुरक्षित और अधिक रिटर्न मिलने लगता है। ऐसे में विदेशी संस्थागत निवेशक (FIIs) भारत जैसे जोखिम भरे उभरते बाजारों से अपना पैसा निकालकर वापस सुरक्षित अमेरिकी बाजारों में निवेश करने लगते हैं।
बाजार में बिकवाली और गिरावट
शेयर बाजार में बिकवाली और गिरावट भी एक अहम है। जब FIIs भारतीय बाजारों से बड़े पैमाने पर पैसा निकालते हैं, तो यहां शेयरों की बिकवाली बढ़ जाती है। इसके परिणाम सेंसेक्स और निफ्टी में भारी गिरावट देखने को मिलती है।
रुपये पर दबाव और डॉलर की मजबूती
अमेरिकी ब्याज दरें बढ़ने से डॉलर मजबूत होता है और भारतीय रुपया कमजोर होने लगता है। कमजोर रुपये के कारण भारत के लिए कच्चा तेल और अन्य आयातित उत्पाद महंगे हो जाते हैं, जिससे देश में महंगाई बढ़ती है और कंपनियों का मुनाफा घटता है।
इसके विपरीत, जब अमेरिकी फेड अपनी ब्याज दरों में कटौती करता है, तो तस्वीर पूरी तरह बदल जाती है। इस स्थिति में भारत जैसे उभरते बाजार में विदेशी निवेश का फ्लो बढ़ जाता है।
बाजारों में विदेशी निवेश की बाढ़
जब अमेरिका में कम ब्याज मिलने लगता है, तो निवेशक अधिक रिटर्न की तलाश में भारत जैसे विकासशील देशों के शेयर बाजारों और म्यूचुअल फंड्स की ओर रुख करते हैं।
घरेलू शेयर बाजार में तेजी
विदेशी निवेशकों (FIIs) का पैसा जब भारी मात्रा में भारतीय बाजार में आता है, तो शेयरों की मांग बढ़ती है और शेयर बाजार में जोरदार तेजी देखने को मिलती है।
भारतीय रुपये में मजबूती
डॉलर के मुकाबले रुपये की स्थिति मजबूत होती है, जिससे आयात सस्ता होता है और भारतीय कंपनियों को राहत मिलती है।
अमेरिकी ट्रेजरी बॉन्ड यील्ड इस पूरी प्रक्रिया का सबसे बड़ा पैमाना है। जब अमेरिका में ब्याज दरें बढ़ती हैं, तो बॉन्ड यील्ड बढ़ जाती है। वैश्विक निवेशक शेयर बाजार के जोखिम को छोड़कर सुरक्षित बॉन्ड यील्ड की तरफ भागते हैं, जिससे भारतीय शेयर बाजार पर दबाव बनता है।