
टांय-टांय फिस्स हो गए पीके (सौ.सोशल मीडिया)
नवभारत डिजिटल डेस्क: पड़ोसी ने हमसे कहा, ‘निशानेबाज, चुनाव रणनीतिकार प्रशांत किशोर ने व्यर्थ का दुस्साहस या मिसएडवेंचर किया। वह चुनावी थ्योरी बनाने तक ठीक थे, प्रैक्टिकल में जीरो थे। चुनाव में उनकी जनसुराज पार्टी का खाता तक नहीं खुला। पिच पर आते ही क्लीन बोल्ड हो गए।’
हमने कहा, ‘क्रिकेट के समान चुनाव भी गेम ऑफ चान्स रहता है। या तो खिलाड़ी सेंचुरी मारता है या जीरो पर आउट हो जाता है। प्रशांत किशोर न तो बिहारकी जनता को समझे और न जनता उन्हें समझ पाई। उन्होंने जाति समीकरण साधने की बजाय शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार को मुद्दा बनाया। बीजेपी पर आरोप लगाया कि वह उनकी जनसुराज पार्टी के प्रत्याशियों को प्रलोभन देकर नाम वापस लेने के लिए कह रही है।’
पड़ोसी ने कहा, ‘निशानेबाज, बिहार के ग्रामीण लोगों तक पीके की पार्टी पहुंची ही नहीं। लोगों को उनकी पार्टी का चुनाव चिन्ह और उम्मीदवार का नाम तक मालूम नहीं था। ऐसे में वोट कहां से मिलते? राज्य में कोई आधार नहीं था फिर भी 240 सीटों पर चुनाव लड़ना उनकी सनक नहीं तो और क्या था! यह कुछ ऐसी बात थी कि बौना आकाश छूने चला ! मैदानी राजनीति का कोई अनुभव नहीं था लेकिन चुनाव लड़ने की मस्ती चढ़ी। हवाई किला या ताश का महल टिकता नहीं, फूंक मारने से गिर जाता है।’
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हमने कहा, ‘प्रशांत किशोर खुद चुनाव नहीं लड़े। उन्हें लगा कि राघोपुर से चुनाव में उतरेंगे तो वहीं फंसकर रह जाएंगे और पार्टी के प्रचार के लिए घूम नहीं पाएंगे। मोदी और शरद पवार ने कभी ऐसा नहीं किया। वह हमेशा चुनाव लड़े। यदि सेनापति ही पीछे हट जाए तो फौज क्या लड़ेगी? पीके नई राजनीति का विकल्प देने की कोशिश कर रहे थे लेकिन मतदाताओं ने उनके संकल्प को विफल कर दिया। अब कोई भी पार्टी उनसे चुनावी रणनीति नहीं बनवाएगी। जो खुद एक सीट जीतने की औकात नहीं रखता, वह दूसरों को क्या जिताएगा? उनकी पोल स्ट्रेटेजी की दुकान अब बंद ही समझो !’
लेख- चंद्रमोहन द्विवेदी के द्वारा






