कॉन्सेप्ट फोटो (डिजाइन)
Supreme Court SOP On Cyber Crime: बैंक यदि संदिग्ध लेन-देन पर ग्राहकों को सतर्क करते और साइबर अपराधों की पहचान तथा जांच के लिए अंतर-एजेंसी समन्वय मजबूत रखते, तो आंकड़े शायद अलग दिखते। इस पर पूरी रोक के लिए व्यापक बहुआयामी उपाय अपनाने होंगे, जिसमें न सिर्फ बैंकिंग व्यवस्था सुधार, तकनीक, जन जागरूकता बल्कि दूसरे कारकों पर भी ध्यान देना होगा।
डिजिटल युग की तेज रफ्तार ने आसान भुगतान को साइबर ठगों ने विविध तरीकों से लूट का हथियार बना लिया। वह फिशिंग ई-मेल से लिंक क्लिक करवाता है, स्मिशिंग से एसएमएस तो विशिंग फोन कॉल से ओटीपी मांगता है। स्पियर फिशिंग लक्षित व्यक्ति पर हमला करता है, तो स्किमिंग एटीएम से कार्ड डेटा चुराता है और सिम स्वैप नंबर हाईजैक करता है।
वेबसाइट स्पूफिंग बैंक साइट की नकल से, मेलवेयर डिवाइस संक्रमित करता है। जनता को स्मिशिंग-स्पियर फिशिंग से सबसे ज्यादा नुकसान होता है। क्योंकि ये रोजमर्रा के संदेश सरीखे लगते हैं। यदि बैंक संदिग्ध तौर पर किसी खाते से अचानक बड़ी रकम निकासी या अनजान स्रोतों से फंड ट्रांसफर को समय पर चिन्हित कर सूचना की प्रणाली को ईमानदारी से अपनाते तो यह मामले काफी कम होते। अपराधियों द्वारा पैसों की हेराफेरी कर करोड़ों रुपये विदेशों को भेज पाना बिना बैंकों की लापरवाही और उनके इस खेल में शामिल हुए बिना संभव नहीं है।
इसकी रोकथाम के लिए आवश्यक है कि बैंक बायोमेट्रिक वेरिफिकेशन, डिवाइस फिंगर प्रिंटिंग उचित प्रकार से अपनाएं तथा एआई से रीयल-टाइम मॉनिटरिंग करने के अलावा एफआईयू इंडिया को रिपोर्टिंग और अंतर-बैंक डाटा शेयरिंग बढ़ाएं तो ये उपाय 50 फीसदी तक डिजिटल फ्रॉड रोक सकते हैं। नए खातों पर लेन-देन सीमा, लाभार्थी जोड़ने पर ‘कूलिंग-ऑफ’ अवधि और उच्च जोखिम श्रेणी की सतत निगरानी प्रभावी उपाय हो सकते हैं। फ्रॉड की जड़ें सोशल मीडिया इंटरमीडियरीज प्लेटफॉर्मों से जुड़ती हैं।
फर्जी विज्ञापन, स्पूफ वेबसाइट, डीएम या मैसेजिंग के जरिए फिशिंग और म्यूल अकाउंट में धन-स्थानांतरण के ये कारक हैं। यदि सोशल मीडिया कुछ ही घंटों में संदिग्ध अकाउंट हटाए, केवाईसी डाटा जांच एजेंसियों से साझा करे, तो नेटवर्क तोड़ा जा सकता है।
साइबर अपराधी कमाई को क्रिप्टो, प्रीपेड कार्ड या लेयरिंग के जरिए बाहर भेजते हैं। इसके लिए अंतरराष्ट्रीय सहयोग, एफआईयू-ईडी-सीबीआई समन्वय और वर्चुअल एसेट सर्विस प्रोवाइडर्स पर सख्त नियम अनुपालन आवश्यक है। संदिग्ध विदेशी रेमिटेंस पर अस्थायी होल्ड और लाभार्थी देशों के साथ त्वरित म्यूचुअल लीगल असिस्टेंस समझौते इसमें मददगार हो सकते हैं।
हालांकि सीबीआई और राज्य साइबर सेल की क्षमता बढ़ी है, डिजिटल अरेस्ट के कई मामले सुलझाए गए हैं, तो पिछले साल बैंक फ्रॉड मामलों में गिरावट आई पर राशि 3 गुना बढ़कर 36,000 करोड़ रुपये हो गई। कार्ड-इंटरनेट फ्रॉड के 13,516 मामलों में 520 करोड़ की ठगी हुई और कुल डिजिटल फ्रॉड 54,000 करोड़ के पार चला गया।
अदालत को केंद्र सरकार द्वारा जारी एक एसओपी निस्संदेह समयोचित हस्तक्षेप है, पर किसी एक एसओपी के जरिए इतने बड़े और विविध स्तर पर होने वाले साइबर और डिजिटल वित्तीय अपराध को नहीं रोका जा सकता है। डिजिटल साधनों के व्यापक और तीच विस्तार के अनुरूप डिजिटल प्राइवेसी के उल्लंघन के खिलाफ पर्याप्त कानून और सुरक्षा ढांचा विकसित नहीं हो पाया है। लाखों लोग एक ही फोन नंबर या ईमेल से कई प्लेटफॉर्म पर जुड़े हैं, जिससे फ्रॉड करने वालों को उपयोगकर्ता के प्रोफाइल तक आसानी से पहुंच मिल जाती है।
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आवश्यकता है कि डाटा सुरक्षा कानून को अधिक स्पष्ट, उपयोगकर्ता केंद्रित और सख्त बनाया जाए और इसका पालन भी सुनिश्चित हो। इसके साथ-साथ डिजिटल शिक्षा, व्यापक जागरूकता, डाटा प्राइवेसी कानूनों का सख्त अनुपालन और बैंकिंग तंत्र की सक्रिय भूमिका भी अत्यावश्यक है। बात डिजिटल फ्रॉड से पीड़ितों को मुआवजे की भी है।
डिजिटल धोखाधड़ी से बचाव के लिए सुप्रीम कोर्ट द्वारा केंद्र सरकार को पूरे देश में एक मानकीकृत संचालन प्रक्रिया अथवा एसओपी लागू करने का निर्देश अत्यंत स्वागत योग्य है। उसने सीबीआई से डिजिटल अरेस्ट के अपराधियों को पहचानने के लिए भी कहा है और बैंकों को भी उनकी कार्यप्रणाली में खोट, लापरवाही व मिलीभगत के लिए भी लताड़ा है, वाकई 54 हजार करोड़ रुपये के फ्रॉड का आंकड़ा बहुत बड़ा है और इस मर्ज की अकसीर दवा न तलाशी गई तो रोग वित्तीय नासूर बन जाएगा।
– लेख संजय श्रीवास्तव के द्वारा