नवभारत विशेष: परिसीमन के बहाने सियासी पासा फेंकना आत्मघाती, उत्तर बनाम दक्षिण की छिड़ेगी जंग?
Delimitation Bill 2029: महिला आरक्षण और 2029 के चुनावों से पहले परिसीमन का मुद्दा गरमा गया है। क्या उत्तर भारत का बढ़ता राजनीतिक दबदबा दक्षिण भारतीय राज्यों की क्षेत्रीय अस्मिता के लिए खतरा बन जाएगा?
- Written By: आकाश मसने
संसद भवन (डिजाइन फोटो)
Delimitation Bill Politics: लोकतंत्र में कुछ ऐसे फैसले होते हैं, जो कागज पर भले ‘तकनीकी’ दिखें, लेकिन व्यवहार में उनका असर भावनाओं को भड़काने वाला हो सकता है। तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन ने परिसीमन बिल को आग में जलाया है। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि महिला आरक्षण विधेयक के साथ जो परिसीमन की कार्रवाई का प्रावधान है, वह आने वाले दिनों में आत्मघाती निर्णय साबित हो सकता है। हालांकि यह भी तय है कि आज नहीं तो कल परिसीमन होना ही है, लेकिन परिसीमन का अभी तक जो आधार रहा है, अगर इसमें वैज्ञानिक ढंग से बदलाव न किया गया, तो यह एक ऐसे मुद्दे में बदल जाएगा, जहां सीटों का गणित, क्षेत्रीय अस्मिता की राजनीति भड़कने में देर नहीं लगेगी। इससे उत्तर बनाम दक्षिण के बेहद संवेदनशील विमर्श के खड़े होने की आशंका है, जो कि आत्मघाती साबित हो सकता है, लगभग समूचा विपक्ष परिसीमन के विरोध में खड़ा हुआ है।
क्या है परिसीमन बिल?
महिला आरक्षण कानून में संशोधन से जुड़े जिन 3 बिलों का एक अनिवार्य हिस्सा परिसीमन बिल भी है। क्योंकि महिलाओं को लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में 2029 से 33 फीसदी आरक्षण देने का जो प्रस्ताव है, उसके चलते लोकसभा के सांसदों की संख्या 850 होनी है। जबकि मौजूदा संख्या 543 है। इन 850 सांसदों में 815 राज्यों से होंगे और 35 सांसद विभिन्न केंद्र शासित प्रदेशों से होंगे। सीटों की ये सटीक संख्या इसलिए लाजमी है, क्योंकि तभी परिसीमन के बाद 243 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित हो सकेंगी। जिस तरह की पुरुष वर्चस्व वाली राजनीति है, उसमें बिना परिसीमन किए महिलाओं के लिए लोकसभा में आरक्षण लगभग असंभव है। अगर ऐसा हुआ, तो महिलाओं के लिए जो सीटें आरक्षित होंगी, यह वो सीटें होंगी, जिनमें अभी तक ज्यादातर पुरुषों का कब्जा रहा है।
इन सब बातों को ध्यान में रखकर ही जिस महिला आरक्षण विधेयक को साल 2023 में केंद्र सरकार ने ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम‘ के रूप में संसद में पेश किया था और लोकसभा तथा राज्यसभा दोनों में इसके पारित होने के बाद कानून बन गया था। उस कानून के मुताबिक 2027 की जनगणना पूरी होने के बाद ही परिसीमन होना था, जिसके कारण यह कानून 2034 तक टल सकता था। अब इसे 2011 की जनगणना के आधार पर ही लागू कराने की बात हो रही है ताकि 2029 में यह कानून लागू हो जाए।
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2029 में ही अगला लोकसभा चुनाव और उसी साल ओड़िशा, आंध्र प्रदेश, सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश विधानसभाओं के चुनाव भी होने हैं। ऐसे में उत्तर बनाम दक्षिण की राजनीतिक बहस छिड़ जाना लाजमी है। क्योंकि अगर यह बिल पास हो जाता है और मौजूदा जनगणना यानी 2011 के मुताबिक परिसीमन होता है, तो उत्तर और दक्षिण के बीच सीटों का संतुलन ही नहीं गड़बड़ाएगा, बल्कि पूरी तरह से बदल जाएगा।
उत्तर का दबदबा बनाम दक्षिण की चिंता
लोकसभा में 543 सीटें हैं, उसमें 225 से 240 सीटें उत्तर भारत और हिंदी पट्टी के हिस्से आती हैं, जिनमें उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान आदि शामिल हैं। जबकि दक्षिण के 5 राज्यों तमिलनाडु, कर्नाटक, केरल, आंध्र प्रदेश में 125 से 130 सीटें बनती हैं। अगर 2011 की जनसंख्या के आधार पर 2026 के बाद परिसीमन लागू कर दिया जाता है, तो उत्तर प्रदेश की मौजूदा जनगणना के मुताबिक इसकी वर्तमान 80 सीटें बढ़कर 120 से 130 तक पहुंच सकती हैं।
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बिहार की मौजूदा 40 लोकसभा सीटें 60 से 65 हो सकती हैं, मध्य प्रदेश की लोकसभा सीटें 29 से बढ़कर 40 या 45 तथा राजस्थान की 25 सीटें बढ़कर 35 से 40 तक हो सकती हैं। इस तरह मौजूदा जनगणना के आधार पर परिसीमन से हिंदी पट्टी के सांसदों की संख्या 80 से 120 तक बढ़ सकती है, जबकि इसी दौरान तमिलनाडु की 39 सीटें बढ़कर 40 से 45 तक हो सकती हैं। कर्नाटक की 28 सीटें, 30 से 34 तक जाएंगी। केरल की 20 सीटें 20 से 22 तक होंगी। आंध्र प्रदेश की 25 सीटें बढ़कर 28 से 30 होंगी, जबकि तेलगांना की 17 सीटें बढ़कर 20 से 22 तक पहुंचेंगी।
उत्तर भारत के राज्यों की, जिसकी मौजूदा लोकसभा सीटें फिलहाल 230 हैं, वो बढ़कर 300 से 350 तक पहुंच जाएंगी। जबकि दक्षिण भारत की मौजूदा 130 सीटें बढ़कर केवल 150 से 170 तक ही पहुंचेंगी। इसका मतलब साफ है कि अगर मौजूदा जनंसख्या और नियमों के मुताबिक परिसीमन हुआ तो दक्षिण भारत पर पूरी तरह से उत्तर भारत का राजनीतिक दबदबा कायम हो जाएगा।
लेख- लोकमित्र गौतम के द्वारा
