चीनी हथियार (डिजाइन फोटो)
Chinese Weapons Failure: मीडिया में ईरान के चीनी हथियारों की विफलता का शोर है, विशेषज्ञ इसे ऑपरेशन सिंदूर के समय पाकिस्तान और वेनेजुएला में मिली असफलता से जोड़ रहे हैं, क्या वाकई चीन अपने हथियार निर्माण और उसके बाजार में बुरी तरह पिछड़ रहा है या यह प्रचार अमेरिकी लॉबी की चाल है? हाल ही में अमेरिका इजराइल से ईरान के संघर्ष में चीनी हथियारों की विफलता विफलता दिखाई दी जब पिछले दो महीने पहले ही डिलिवर हुआ नया नकोर चीनी एयर डिफेंस सिस्टम एचक्यू-9 अमेरिकी मिसाइलों को रोक नहीं पाया।
चीनी एयर डिफेंस सिस्टम उम्मीदों पर कतई खरे नहीं उतरे, कंबोडिया में चाइनीज लाइट मशीन गन का बार-बार जाम होना। बांग्लादेश के एफ-7 जेट्स, मुख्य युद्धक टैंक-2000 और फ्रिगेट्स में रडार तथा इंजिन में खराबी पाया जाना। पाकिस्तान के एचक्यूर पी, एचक्यू 16 सैम सिस्टम और वाईएलसी 8ई रडार ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारतीय हमलों के आगे नाकाम रहना इसकी मिसाल है।
म्यांमार के चीनी जेएफ-17 जेट्स ढांचे में दरारें पाये जाने से ग्राउंड करने पड़े। नाइजीरिया के एफ-7 बार-बार क्रैश हुए तो उसने बचे विमानों को चीन को लौटा दिया। चीनी मिसाइलें बहुधा लक्ष्य से भटकती दिखीं, तो ड्रोन बिना अपने लक्ष्य पर पहुंचे टपकते रहे। चीनी हथियारों के घटिया होने के जो प्रमुख कारण समझ में आते हैं उनका रिवर्स इंजीनियर्ड होना, खराब विनिर्माण, गुणवत्ता नियंत्रण का कमजोर होना, अपर्याप्त परीक्षण और हथियार को सस्ता करने के चक्कर में उसकी सक्षमता से समझौता है।
चीन जिन देशों को हथियार बेचता है वे पाकिस्तान, अल्जीरिया, मिस्र, इथियोपिया, इंडोनेशिया, इराक, सऊदी अरब, मिस्र और उज्बेकिस्तान, सेनेगल, वेनेजुएला और बोलीविया मोरक्को, म्यांमार, सर्बिया और यूएई वगैरह युद्ध जैसी परिस्थितियों में उसकी वास्तविक क्षमता कम ही परख पाते हैं।
चीन ने खुद 1979 के बाद से कोई बड़ा युद्ध नहीं लड़ा। उसकी आधुनिक प्रणालियां वास्तविक युद्ध में परखी नहीं गई जबकि अमेरिकी और यूरोपीय हथियार लगातार परखे जाते रहे हैं। चीन के हथियार अगर इतने बेकार हैं तो बिकते क्यों हैं? चीन दुनिया का चौथा सबसे बड़ा हथियार निर्यातक कैसे बना हुआ है?
असल में चीनी हथियारों को कई विकासशील देश इसलिये खरीदते हैं क्योंकि ये उनके बजट के अनुकूल या सस्ते होते है, कई बार तो पश्चिमी या यूरोपीय हथियारों से आधे दाम में मिलते हैं। पाकिस्तान अगर चीनी पीएल 15 मिसाइलें और एचक्यू-9 एयर डिफेंस की जगह अमेरिकी पैट्रियट या यूरोपीय मेटियोर खरीदता तो उसे दुगने दाम देने पड़ते। बांग्लादेश जैसे देशों को वह सॉफ्ट लोन, कम ब्याज और लंबी अवधि वाली किश्तों पर हथियार बेच देता है तो ईरान को तेल के बदले हथियार बेच देता है।
भारत आसपास चीनी हथियारों की भरमार है। पाकिस्तान के पास जीएफ-17, एचक्यू-9 वायु रक्षा प्रणाली और चीनी ड्रोन हैं तो बांग्लादेश, म्यांमार और श्रीलंका में भी चीनी नौसैनिक प्लेटफॉर्म मौजूद हैं। हिंद महासागर में चीनी मूल के पोत और पनडुब्बियां दीर्घकालिक चुनौती बनी हुई हैं इसके अलावा म्यांमार भी चीनी हथियार रखता है। भारत के पास चीनी कैरियर किलर और डीएफ 26, वाईजे-21 हाइपरसोनिक, पीएल-17 बीवीआर मिसाइलों और बड़े पैमाने की ड्रोन-उत्पादन क्षमता का फिलहाल कोई काट नहीं। उसके जे-20 स्टील्थ फाइटर और डीएफ-जेड एफ ग्लाइडर भी हमारे लिए बड़ी चुनौती हैं।
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चीनी हथियारों के घटिया होने के जो प्रमुख कारण समझ में आते हैं- उनका रिवर्स इंजीनियर्ड होना, खराब विनिर्माण, गुणवत्ता नियंत्रण का कमजोर होना, अपर्याप्त परीक्षण और हथियार को सस्ता करने के चक्कर में उसकी सक्षमता से समझौता है। चीन जिन देशों को हथियार बेचता है वे पाकिस्तान, अल्जीरिया, मित्र, इथियोपिया, इंडोनेशिया, इराक, सऊदी अरब, मिस्त्र और उज्बेकिस्तान, सेनेगल, वेनेजुएला और बोलीविया मोरक्को, म्यांमार, सर्बिया और यूएई वगैरह युद्ध जैसी परिस्थितियों में उसकी वास्तविक क्षमता कम ही परख पाते हैं।
लेख- संजय श्रीवास्तव के द्वारा