नीतीश कुमार, शरद यादव, लालू प्रसाद यादव व जॉर्ज फर्नांडिस (डिजाइन फोटो)
Nitish Kumar Rajya Sabha Nomination: बिहार की राजनीति के केंद्र में लगभग दो दशक रहने के बाद मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की विधानमंडल राजनीति का अंत हो गया है। इसके साथ ही देश की राजनीति के सबसे प्रमुख राज्यों में अब एक नए अध्याय की शुरूआत होने जा रही है। हालांकि इस समापन को विधानसभा चुनाव के पहले महसूस किया जा रहा था लेकिन यह फैसला भी चुनाव के चौंकाने वाले परिणामों की तरह ही सामने आया। 2005 से 2026 तक लगातार बिहार की कमान संभालने वाले नीतीश कुमार ने 10वीं बार मुख्यमंत्री का रिकॉर्ड रचने के चार माह बाद गुरुवार सुबह भाजपा के चाणक्य अमित शाह की मौजूदगी में राज्यसभा के लिए अपना नामांकन भर दिया।
यहां यह याद रखना जरूरी है कि 2014 में, नीतीश कुमार ने कुछ समय के लिए खुद को नरेंद्र मोदी के नेशनल विकल्प के तौर पर पेश करने की कोशिश की थी। लेकिन, जैसे ही हिंदुत्व की राजनीति की लहर तेज हुई, उन्होंने अपनी रणनीति में बदलाव किया और यह नतीजा निकाला कि बीजेपी के नेतृत्व वाले गठबंधन से लंबे समय तक बाहर रहना राजनीतिक रूप से समझदारी नहीं होगी। राष्ट्रीय जनता दल के साथ महागठबंधन के साथ कुछ समय के प्रयोग करने के बाद, वह जुलाई 2017 में एनडीए में वापस आ गए। 2022 में विपक्षी खेमे में जाने के बाद के सालों में उनके गठबंधन बदलते रहे, और जनवरी 2024 में फिर से बाहर निकल गए, यह कहते हुए कि यह व्यवस्था टिकने लायक नहीं है।
दस बार के मुख्यमंत्री ने सुशासन बाबू की इमेज बनाई थी। एक ऐसे नेता जो गवर्नेस में सुधार और प्रशासनिक क्षमता से जुड़े थे। हालांकि, हाल के सालों में वह इमेज धुंधली होने लगी। राजनीतिक हलकों में नीतीश कुमार की गिरती सेहत के बारे में कानाफूसी बढ़ रही थी, कुछ लोगों का कहना है कि उनकी बिगड़ती हालत ने उनके पद छोड़ने के फैसले में भूमिका निभाई है।
हाल ही में हुए बिहार चुनावों के दौरान, यह साफ था कि बीजेपी ने जेडीयू को अपने में मिला लिया था और पार्टी के कामकाज पर अपनी पकड़ मजबूत कर ली थी। कैंडिडेट चुनने से लेकर सोशल मीडिया कैंपेन तक भाजपा ने सारे निर्णय लिए और जेडीयू ने पालन किया। इसे देखते हुए जदयू और बीजेपी में विलय की अटकले भी सामने आईं, हालांकि ऐसा अधिकृत विलय नहीं हुआ, लेकिन कई लोगों का मानना है कि पॉलिटिकल तौर पर, सबमें शामिल होने का प्रोसेस पूरा हो गया है।
तमाम विरोधाभास के बाद भी नीतीश कुमार व्यक्तिगत ईमानदारी और साफ छबि के लिए भी जाने जाएंगे। एक ऐसा राज्य जहां आरजेडी, हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा और लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) जैसी पार्टियां परिवारवाद को आगे बढ़ाती आई हैं, नीतीश कुमार इसके बिल्कुल खिलाफ रहे। हालांकि, अब निशांत के डिप्टी सीएम बनने यह उनकी इस छबि को धक्का जरूर लगने वाला है। बिहार विधानसभा से उनका जाना उस दौर का अंत है जिसे कई विश्लेषक लालू-नीतीश युग कहते हैं। लालू प्रसाद यादव के पहले ही सक्रिय राजनीति से रिटायर होने के साथ, बिहार अब एक अनिश्चित राजनीतिक बदलाव की ओर है।
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इस घटनाक्रम को ठीक उसी हर मलिया या कहा जैसे नीतीश कुमार ने जनता दल यूनाइटेड पर नियंत्रण करने के लिए जॉर्ज फर्नांडिस और शरद यादव जैसे दिग्गज समाजवादियों को साइडलाइन किया था। दरअसल, जनता दल (यूनाइटेड) की स्थापना 30 अक्टूबर, 2003 को हुई थी, जो जनता दल के शरद यादव के गुट, जॉर्ज फर्नांडिस और नीतीश कुमार के नेतृत्व वाली समता पार्टी और लोक शक्ति पार्टी के मर्जर से बनी थी। इस मर्जर ने बिहार में लालू प्रसाद यादव के विरोधी खेमे को मजबूत किया और नीतीश कुमार के समाजवाद, पिछड़ी जातियों की लामबंदी और गवर्नेस में सुधार के वादों पर आधारित एक क्षेत्रीय ताकत के रूप में उभरने का रास्ता बनाया।
लेख- चंद्रमोहन द्विवेदी के द्वारा