नवभारत संपादकीय: बारामती उपचुनाव में टूटी निर्विरोध परंपरा? सुनेत्रा पवार के सामने कांग्रेस का अड़ंगा
Baramati Bypoll Controversy: बारामती उपचुनाव में निर्विरोध परंपरा पर सवाल, सुनेत्रा पवार के सामने कांग्रेस ने उम्मीदवार उतारा। फैसले को लेकर सियासी विवाद तेज।
- Written By: अंकिता पटेल
Unopposed Election Tradition Debate ( Source: Social Media )
Unopposed Election Tradition Debate: आम तौर पर यह सौजन्यपूर्ण परंपरा रही है कि यदि किसी ॥ जनप्रतिनिधि का निधन हो जाए तो उसकी सीट पर होने वाला उपचुनाव निर्विरोध हो। उपमुख्यमंत्री अजीत पवार के निधन के बाद बारामती में और बीजेपी विधायक शिवाजीराव कर्डिले के देहांत के बाद अहिल्यानगर जिले के राहुरी में रिक्त सीट पर उपचुनाव होने जा रहा है।
राष्ट्रवादी कांग्रेस ने बारामती से उपमुख्यमंत्री सुनेत्रा पवार की तथा बीजेपी ने राहुरी से अक्षय शिवाजीराव कर्डिले की उमीदवारी घोषित की है। मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने सभी पार्टियों से अनुरोध किया है कि बारामती उपचुनाव निर्विरोध संपन्न किया जाए, सुनेत्रा पवार ने भी उद्धव ठाकरे व प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष हर्षवर्धन सपकाल से अनुरोध किया कि उन्हें निर्विरोध निर्वाचित होने दिया जाए, इसके बावजूद सुनेत्रा की राह में रोड़ा अटकाते हुए कांग्रेस ने बारामती से एड। आकाश मोरे को अपना उमीदवार बनाया है। कांग्रेस का यह कदम परंपरा के खिलाफ होने से आलोचना का विषय बन गया है।
राज्य के प्रशासन पर मजबूत पकड़ रखने वाले अजीत पवार ने बीजेपी की युति से नाता जोड़ने से पहले काफी समय तक कांग्रेस के सहयोग से राजनीति की थी। उनके दुर्घटना में निधन के बाद बारामती उपचुनाव में प्रत्याशी उतारने की कांग्रेस की हठ खटकने वाली है।
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वास्तव में यह जगह एनसीपी (शरद पवार) के हिस्से की है। उसने पहले ही यहां उमीदवार खड़ा नहीं करने का फैसला ले लिया है। बीजेपी ने कांग्रेस के रवैये की आलोचना की है। कांग्रेस के विधानपरिषद सदस्य शरद रणपिसे के निधन के बाद बीजेपी ने उमीदवारी वापस लेकर कांगेस की प्रज्ञा सातव को निर्विरोध निर्वाचित होने दिया था।
विधानपरिषद के इस मामले को छोड़ दें तो बीजेपी ने प्रत्येक उपचुनाव में अपनी ताकत आजमाई थी। कोविड के दौरान पंढरपुर-मंगलवेढ़ा के राष्ट्रवादी कांग्रेस के विधायक भरत भालके का निधन हुआ था। उनकी सीट पर हुए उपचुनाव में बीजेपी ने उनके पुत्र भागीरथ भालके को हराकर यह सीट जीती थी।
हाल ही नांदेड लोकसभा उपचुनाव में दिवंगत सांसद वसंत चव्हाण के पुत्र के खिलाफ बीजेपी ने उमीदवार खड़ा किया था। लगता है, इसी वजह से कांग्रेस भी ऐसी अड़ियल भूमिका ले रही है। लोकतंत्र की मजबूती के लिए सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच संवाद होना चाहिए लेकिन ऐसी स्थिति नहीं है।
अब विपक्ष को उखाड़ फेंकने की भाषा बोली जाती है। पहले महाराष्ट्र अपनी सुसंस्कृत व सौजन्यपूर्ण राजनीति के लिए प्रसिद्ध था, लेकिन 2019 के बाद स्थितियां बदल गई।
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विपक्ष के विधायकों की निधि रोकने, विकास की प्रक्रिया से उन्हें अलग रखने तथा व्यक्तिगत आलोचना करने से तनाव बढ़ता गया। चंद्रपुर महापालिका के चुनाव के बाद कांग्रेस को अवसर न देते हुए शिवसेना से तालमेल कर बीजेपी ने महापौर पद हासिल कर लिया। ऐसे में राजनीतिक सौजन्य कैसे टिका रह सकता है।
लेख- चंद्रमोहन द्विवेदी के द्वारा
