मुकदमा, अपील-दलील कुछ मत होने दो, निकालो तमंचा, सीधे ठोक दो
सोमवार को बदलापुर रेप केस के आरोपी अक्षय शिंदे की पुलिस एनकाउंटर में मौत हो गई। उसके बाद पुलिस ने वही कहानी दोहराई जो अमूमन हर एनकाउंटर में आरोपी की मौत के बाद दोहराई जाती है। हर एनकाउंटर की तरह इस पर भी सवाल उठे। इन सवालों के जवाब में 'पड़ोसी' और 'निशानेबाज' की व्यंग्यात्मक बातचीत पढ़ें और आनंद लें।
- Written By: मृणाल पाठक
बदलापुर एनकाउंटर केस (डिजाइन फोटो)
पड़ोसी ने हमसे कहा, ‘‘निशानेबाज, हमारी समझदार पुलिस जानती है कि देश की अदालतों पर लाखों मुकदमों का बोझ है। कोर्ट में तारीख पे तारीख मिलती चली जाती है। मामला लंबा चलने से साक्ष्य या सबूत कमजोर पड़ जाते हैं। गवाह अपने बयानों से मुकर जाते हैं। चालाक वकील अपनी दलील से दरिंदे को भी बेदाग छुड़ा लेते हैं। इसलिए पुलिस कभी-कभी अपने हिसाब से त्वरित न्याय करती है। इसे एन्काउंटर कहा जाता है। कहीं बुलडोजर चलता है तो कहीं तमंचा! इसे लेकर मचता है बवाल और निकाली जाती है बाल की खाल!’’
हमने कहा, ‘‘आप कहना क्या चाहते हैं? अपराध बढ़ते हैं तो चिल्लाते हैं और जब किसी जघन्य अपराधी, माफिया या समाजकंटक की एन्काउंटर में मौत हो जाती है तो मानवाधिकार के नाम पर हंगामा खड़ा कर देते हैं। क्या राम ने रावण के खिलाफ या कृष्ण ने कंस के खिलाफ कोई चार्जशीट दाखिल की थी?’’
पड़ोसी ने कहा, ‘‘निशानेबाज, हमारे देश में जंगल राज नहीं बल्कि कानून का राज होना चाहिए। पुलिस का कर्तव्य अपराधी को पकड़ना उसके खिलाफ सारे सबूत जुटाना और आरोपपत्र तैयार कर अदालत में पेश करना है। फैसला करने का हक सिर्फ अदालत को है। न्याय शास्त्र तो यह भी कहता है कि चाहे 100 गुनहगार छूट जाएं लेकिन एक बेगुनाह को सजा न हो। इस वजह से बेनेफिट आफ डाउट या संदेह का लाभ उठाकर कितने ही अपराधी रिहा कर दिए जाते हैं और बाहर आकर फिर अपराध करने लगते हैं।’’
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पड़ोसी ने कहा, ‘‘इस समस्या का इलाज यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने खोजा। योगी की अंतरदृष्टि दिव्य ज्ञान देती है। उन्होंने राज्य की पुलिस से कहा कि तुम्हारे हथियार सिर्फ दिखाने के लिए नहीं हैं। उनका इस्तेमाल करो। ऐसा संकेत मिलने के बाद पुलिस को फ्री हैंड मिल गया। माफिया के अवैध निर्माण पर बुलडोजर चलने लगा। ऐसे खूंखार अपराधी सीधे ठोंके जाने लगे जिनके खिलाफ शिकायत करने या गवाही देने की कोई हिम्मत नहीं करता था और वे मूंछों पर ताव देकर कोर्ट से छूट जाते थे।’’
हमने कहा, ‘‘एन्काउंटर सही था या फर्जी, इसे लेकर संदेह व्यक्त किया जाता है। लोगों को लगता है कि शातिर अपराधी को निपटाने के लिए पुलिस उसका गेम कर देती है। यह भी सवाल उठता है कि अपराधी के सिर में गोली क्यों मारी जाती है, पैर में क्यों नहीं? इतना जरूर है एन्काउंटर से दरिंदों के मन में दहशत पैदा की जा सकती है। महाराष्ट्र पुलिस का प्रतीक चिन्ह या ‘लोगो’ है- सदरक्षणाय खलनिग्रहणाय। इसका अर्थ है सज्जनों की रक्षा करना और दुर्जनों का निर्मूलन करना।’’
लेख- चंद्रमोहन द्विवेदी द्वारा
