गुड़ी पड़वा के दिन तेल से क्यों करते हैं स्नान? जानिए असली वजह और इसका महत्व
Gudi Padwa Special Rituals :गुड़ी पड़वा पर तेल से स्नान करना शुभ माना जाता है। मान्यता है कि इससे शरीर शुद्ध होता है और नए साल की शुरुआत अच्छी ऊर्जा के साथ होती है।
- Written By: सीमा कुमारी
गुड़ी पड़वा(सौ. AI)
Gudi Padwa Oil Bath Tradition: गुड़ी पड़वा मराठी समाज का एक प्रमुख और पारंपरिक पर्व है, जो चैत्र मास की शुक्ल प्रतिपदा को हिंदू नववर्ष विक्रम संवत की शुरुआत के रूप में मनाया जाता है। यह त्योहार 19 मार्च 2026 गुरुवार को मनाया जाएगा, जो नई फसल, समृद्धि और विजय का प्रतीक है। इस दिन घरों के बाहर ‘गुड़ी’ फहराई जाती है और विशेष व्यंजन, जैसे पूरन पोली, बनाए जाते हैं।
बताया जाता है कि, मराठी समाज के लोग गुड़ी पड़वा के दिन घर में गुड़ी बनाकर उसकी पूजा करते है, मान्यता है कि ऐसा करने से घर में सुख-शांति आती है। साथ ही धन-समृद्धि बढ़ती है।
लेकिन हिंदू नववर्ष के पहले दिन यानी कि गुड़ी पड़वा पर धन की देवी मां लक्ष्मी का आशीर्वाद पाने के लिए एक और जरूरी काम किया जाता है, वो है ‘तेल स्नान’. गुड़ी पड़वा के दिन तेल स्नान करने के पीछे धार्मिक और वैज्ञानिक कारण भी वजह हैं।
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कहां तेल स्नान करने की परंपरा निभाई जाती है?
गुड़ी पड़वा त्योहार और तेल स्नान की यह परंपरा विशेष रूप से महाराष्ट्र, गोवा और दक्षिण भारत राज्य में निभाई जाती है। इन राज्यों में गुड़ी पड़वा पर्व साल के प्रमुख त्योहार में से एक है।
तेल स्नान करने की परंपरा के क्या है फायदे
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शारीरिक ऊर्जा व स्फूर्ति
सुबह-सुबह सुगंधित तेल से मालिश और स्नान करने से शरीर में ऊर्जा का संचार होता है और आलस दूर होता है।
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त्वचा का पोषण
तेल त्वचा को हाइड्रेटेड रखता है, उसे मुलायम बनाता है और चमक लाता है।
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रोग प्रतिरोधक क्षमता
बदलते मौसम (बसंत ऋतु) में यह शरीर को संक्रमणों से बचाने और रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने में मदद करता है।
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विषहरण
यह शरीर से विषाक्त पदार्थों को बाहर निकालने में मदद करता है, जिससे शरीर अंदर से शुद्ध होता है।
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रक्त संचार में सुधार
मालिश से शरीर में रक्त का संचार बेहतर होता है और तनाव कम होता है।
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आध्यात्मिक शुद्धि
यह परंपरा नए वर्ष की शुरुआत में मन और शरीर को पवित्र करने का प्रतीक है।
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क्या है गुड़ी पड़वा का महत्व
गुड़ी पड़वा हिंदू नववर्ष का शुभारंभ माना जाता है, जिसका विशेष धार्मिक महत्व है। ‘गुड़ी’ का अर्थ ध्वज या विजय पताका होता है, जबकि ‘पड़वा’ मराठी भाषा में प्रतिपदा तिथि को कहा जाता है।
यही कारण है कि इस पर्व को गुड़ी पड़वा के नाम से जाना जाता है। मान्यता है कि इसी दिन सृष्टि के रचयिता भगवान ब्रह्मा ने जगत की रचना की थी। इसलिए यह तिथि नई शुरुआत, उत्साह और शुभ कार्यों के लिए अत्यंत पवित्र मानी जाती है।
