

दिल्ली और उत्तर भारत में रामलीला के बाद रावण दहन दशहरे का प्रमुख आकर्षण है।
मैसूर में देवी चामुंडेश्वरी की शाही सवारी, तो कुल्लू में सैकड़ों देवी-देवताओं का समागम होता है।
छत्तीसगढ़ के बस्तर में करीब 75 दिनों तक चलने वाले दशहरे में रावण का पुतला नहीं जलाया जाता।
Vijayadashami Traditions India: दशहरा या विजयादशमी को भगवान राम की लंका पर विजय और रावण के वध यानी बुराई पर अच्छाई की जीत के रूप में मनाया जाता है, लेकिन भारत की सांस्कृतिक विविधता इस त्योहार को कई अलग-अलग रूप देती है। कहीं रामायण की कथा मंच पर जीवंत होती है, कहीं महिषासुर पर देवी दुर्गा की विजय का उत्सव मनाया जाता है और कहीं स्थानीय देवी-देवताओं, लोक परंपराओं और सदियों पुराने राजसी आयोजन को आज भी जस का तस मनाया जाता है।
इसीलिए दशहरा को समझने के लिए देश के अलग-अलग हिस्सों की परंपराओं को जानना जरूरी है।
दिल्ली, उत्तर प्रदेश और उत्तर भारत के कई शहरों में दशहरे का सबसे बड़ा आकर्षण रामलीला और रावण दहन है। नवरात्र के दौरान रामायण के प्रसंगों का स्थानीय कलाकारों द्वारा मंचन किया जाता है। विजयादशमी पर भगवान राम की विजय के प्रतीक के रूप में रावण, मेघनाद और कुंभकर्ण के पुतले जलाए जाते हैं।
दिल्ली के रामलीला मैदान से लेकर उत्तर प्रदेश के अयोध्या और वाराणसी के रामनगर तक, रामकथा से जुड़ी परंपराएं इस पर्व को खास बनाती हैं। रामनगर की रामलीला अपनी विस्तृत प्रस्तुति और लंबे समय तक चलने वाले आयोजन के लिए जानी जाती है।
पश्चिम बंगाल में विजयादशमी के रूप में दुर्गा पूजा का समापन होता है। कोलकाता समेत राज्य के कई हिस्सों में पूजा पंडालों में मां दुर्गा की आराधना के बाद मां की प्रतिमा का विसर्जन किया जाता है।
इस दिन महिलाएं मां को नम आंखों से विदाई देती है और इसी के प्रतीक के रूप में सिंदूर खेला होता है। परंपरागत रूप से विवाहित महिलाएं मां दुर्गा को सिंदूर अर्पित करती हैं और एक-दूसरे को सिंदूर लगाती हैं। इसके बाद देवी की विदाई होती है। इस तरह यहां उत्सव रावण दहन नहीं बल्कि मां दुर्गा की विजय और उनके विदा होने से जुड़ा है।
कर्नाटक के मैसूर में दशहरा को मैसूर दशरा के नाम से जाना जाता है। यहां का उत्सव देवी चामुंडेश्वरी की महिषासुर पर विजय से जुड़ा है। इस मौके पर मैसूर पैलेस रोशनी से जगमगाता है और पारंपरिक शाही आयोजनों की रौनक देखने को मिलती है।
उत्सव का खास आकर्षण जंबू सवारी है, जिसमें देवी चामुंडेश्वरी की प्रतिमा को सजे हुए हाथी पर स्वर्ण हौदे में विराजमान कर शोभायात्रा निकाली जाती है। शाही परंपरा, संगीत, सजे हाथी और सांस्कृतिक झांकियों के कारण मैसूर का दशहरा देशभर में बेहद चर्चित है।
हिमाचल प्रदेश की कुल्लू घाटी में दशहरे की परंपरा देश के दूसरे हिस्सों से अलग है। यहां उत्सव विजयादशमी के दिन शुरू होकर लगभग एक सप्ताह तक चलता है, जबकि कई जगहों पर इसी दिन दशहरे का समापन होता है।
कुल्लू और आसपास के इलाकों से स्थानीय देवी-देवताओं की पालकियां और रथ उत्सव में शामिल होने आते हैं। मुख्य आयोजन में भगवान रघुनाथ की शोभायात्रा निकाली जाती है। यह पर्व सिर्फ धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि यहां की कस्वाई और लोक संस्कृति का अहम हिस्सा है।
छत्तीसगढ़ के बस्तर क्षेत्र का दशहरा भारत की सबसे अलग उत्सव परंपरा में गिना जाता है। जगदलपुर में मनाया जाने वाला बस्तर दशहरा करीब एक दिन का नहीं बल्कि 75 दिनों का उत्सव होता है। इसका मुख्य केंद्र भगवान राम और रावण की कथा नहीं, बल्कि मां दंतेश्वरी, स्थानीय देवी-देवता और आदिवासी समुदाय की परंपरा से जुड़ा हैं।
यहां रावण का पुतला नहीं जलाया जाता। उत्सव में रथ से जुड़े अनुष्ठान, स्थानीय देवी-देवताओं का आगमन और सामुदायिक आयोजन महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
राजस्थान के कोटा में दशहरा केवल रावण दहन तक सीमित नहीं है। यहां दशहरा मेला लगता है, जिसकी परंपरा 18वीं सदी से चली आ रही है। मेले में धार्मिक कार्यक्रमों के साथ सांस्कृतिक प्रस्तुतियां, लोक संगीत और कई तरह की गतिविधियां होती हैं। विजयादशमी पर रावण के पुतले का दहन प्रमुख आकर्षण रहता है। इसके बाद मेले में सांस्कृतिक कार्यक्रमों की रौनक बनी रहती है।
भारत में दशहरा का मूल भाव विजय, धर्म और अच्छाई की स्थापना से है, लेकिन हर क्षेत्र की अपनी ऐतिहासिक, धार्मिक मान्यताएं और लोक परंपराएं हैं। उत्तर से लेकर दक्षिण तक मनाए जाने वाले दशहरे की तस्वीर भले ही अलग-अलग हो, लेकिन सबके पीछे सीख एक ही है।