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महाभारत के विराट पर्व में शमी के पेड़ पर पांडवों के अस्त्र-शस्त्र छिपाने का प्रसंग मिलता है।
अज्ञातवास के दौरान अर्जुन ने राजा विराट के पुत्र उत्तर को शमी के पेड़ से हथियार उतारने के लिए कहा था।
विजयादशमी पर शमी पूजन और शस्त्र पूजा को विजय, सामर्थ्य और शुभ शुरुआत से जोड़कर देखा जाता है।
Shastra Puja On Dussehra: दशहरा यानी विजयादशमी को बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक माना जाता है। इस दिन देश के अलग-अलग हिस्सों में रावण दहन, मां दुर्गा की पूजा और कई अन्य धार्मिक परंपराएं निभाई जाती हैं। इनमें शमी के पेड़ की पूजा और शस्त्र पूजा भी शामिल हैं। महाराष्ट्र जैसे राज्यों में शमी या आपटा के पत्तों का आदान-प्रदान भी किया जाता है।
शमी पूजन और शस्त्र पूजा को महाभारत के पांडवों के अज्ञातवास की कथा से भी जोड़ा जाता है। महाभारत के विराट पर्व में बताया गया है कि पांडवों ने अपने अस्त्र-शस्त्र शमी के एक पेड़ पर छिपाकर रखे थे। बाद में अर्जुन ने उन्हें वहां से निकलवाया और कौरवों की सेना का सामना किया।
महाभारत के अनुसार, जुआ में राज्य हारने के बाद पांडवों को 12 साल वनवास और एक साल अज्ञातवास काटना पड़ा था। अज्ञातवास के दौरान उन्हें अपनी पहचान छिपाकर रहना था। यदि उनकी पहचान उजागर हो जाती, तो उन्हें शर्त के अनुसार फिर से वनवास भुगतना पड़ता।
इसी कारण पांडवों ने मत्स्य देश के राजा विराट के यहां अलग-अलग पहचान के साथ रहने का निर्णय लिया। अर्जुन ने बृहन्नला का रूप धारण किया, जबकि अन्य पांडवों ने भी अलग-अलग रूप धारण किए।
अपनी पहचान छिपाए रखने के लिए पांडवों ने अपने अस्त्र-शस्त्र एक शमी के पेड़ पर रख दिए। महाभारत के विराट पर्व में अर्जुन के गांडीव धनुष के साथ अन्य पांडवों के हथियारों का भी उल्लेख मिलता है।
अज्ञातवास के अंतिम चरण में राजा विराट के राज्य पर कौरवों ने हमला किया और वहां के मवेशियों को ले जाने लगे। राजा विराट के पुत्र उत्तर ने कौरवों की सेना का सामना करने के लिए जाने का निर्णय लिया, लेकिन युद्ध का अनुभव न होने के कारण वह घबरा गए।
अर्जुन, जो उस समय बृहन्नला के रूप में रह रहे थे, उत्तर के सारथी बने। इसके बाद उन्होंने अपनी असली पहचान बताई और उत्तर से शमी के पेड़ पर चढ़कर वहां रखे अस्त्र-शस्त्र उतारने के लिए कहा। उत्तर ने पेड़ से हथियार उतारे और अर्जुन ने अपना गांडीव धनुष संभाला। इसके बाद अर्जुन ने कौरवों की सेना का सामना किया और युद्ध में विजय प्राप्त की।
युद्ध में इस्तेमाल होने वाले हथियारों को शक्ति, सुरक्षा और कर्तव्य से जोड़ा जाता रहा है। विजयादशमी पर शस्त्र पूजा करने की परंपरा विशेष रूप से उन समुदायों और परिवारों में दिखाई देती है जिनका ऐतिहासिक संबंध युद्ध, सेना या शस्त्र धारण करने से रहा है।
समय के साथ अब लोग दशहरे पर अपने काम में इस्तेमाल होने वाले औजारों, मशीनों, वाहनों या उपकरणों की भी पूजा करते हैं।
भारत के कुछ हिस्सों में विजयादशमी के दिन शमी के पेड़ की पूजा की जाती है। महाराष्ट्र में शमी के पत्तों का आदान-प्रदान करने की परंपरा भी प्रचलित है। इन पत्तों को सोना कहा जाता है और लोग एक-दूसरे को देकर सुख-समृद्धि की कामना करते हैं।