पर्युषण 2026: 8 दिन आत्मशुद्धि, तप और क्षमा के नाम, जानें क्यों जैन धर्म में सबसे खास है यह महापर्व

Paryushan 2026: जैन समुदाय द्वारा मनाया जाने वाला पर्युषण पर्व केवल त्योहार के रूप में नहीं, बल्कि अपने कर्मों और जीवनशैली की समीक्षा करने तथा आत्मा को शुद्ध करने के अवसर के रूप में मनाते है।
Paryushan 2026 Dates
भगवान महावीर (सौ.सोशल मीडिया)
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Paryushan 2026 Dates : पर्युषण पर्व जैन धर्म के सबसे प्रमुख पर्वों में से एक है। जो हर साल भाद्रपद मास की पंचम तिथि से शुरू होकर अनंत चतुर्दशी तिथि तक मनाया जाता है। ये पर्व आठ या दस दिनों तक चलता है। इस साल पर्युषण महापर्व की शुरुआत 8 सितंबर 2026 से शुरू हो रहा है और आगामी 15 सितंबर तक चलेगी।

जैन धर्म में पर्युषण को पर्वों का राजा कहा जाता है। ये पर्व भगवान महावीर स्वामी के मूल सिद्धांत अहिंसा परमो धर्म, जिओ और जीने दो की राह पर चलना सिखाता है। साथ ही मोक्ष प्राप्ति के द्वार भी खोलता है। इस पर्व का महत्व क्या है और जैन धर्म के इस पर्व को मनाने का कारण क्या है? यहां जानिए

कब से शुरू हो रहा है जैन धर्म का ये खास पर्व

इस साल श्वेतांबर जैन परंपरा में पर्युषण पर्व 8 सितंबर 2026 से शुरू होगा और 8 दिनों तक चलेगा। वहीं, दिगंबर जैन परंपरा में इस पर्व को 10 दिनों तक मनाया जाता है।

आखिर जैन धर्म के लोग क्यों मनाते है पर्युषण पर्व?

जैन समुदाय द्वारा मनाया जाने वाला पर्युषण पर्व केवल त्योहार के रूप में नहीं, बल्कि अपने कर्मों और जीवनशैली की समीक्षा करने तथा आत्मा को शुद्ध करने के अवसर के रूप में मनाते है। अलग-अलग संप्रदायों के अनुसार, यह आठ या दस दिनों तक चलता है। इस पर्व के दौरान जैन धर्म के लोग बाहरी गतिविधियों को कम करने की कोशिश करते हैं और बाहरी आडंबरों से दूर रहते हैं। घर में रहकर ईश्वर की साधना करते हैं।

Paryushan 2026 Dates
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कैसे हुई पर्युषण पर्व की शुरुआत?

प्राप्त जानकारी के अनुसार, पर्युषण पर्व की शुरुआत सदियों पुरानी है। काफी समय पहले लोग छोटे-छोटे और दूर बसे गांवों में रहते थे और उनकी आजीविका जमीन में खेती पर ही निर्भर थी। मानसून में बारिश और फसल की कटाई के बाद, खेती के काम से कुछ समय के लिए लोगों को आराम मिल जाता था, क्योंकि इस दौरान सड़क में पानी भर जाता था और कीड़े-मकोड़ों की संख्या बढ़ जाती थी।

जैन धर्म के लोग प्राचीन समय से ही अहिंसा के अनुयायी थे और यदि वो बारिश में यात्रा करते तो पानी के कीड़े मर सकते थे। इसी वजह से वो लोग इस दौरान कहीं भी यात्रा नहीं करते थे और खुद की शुध्दि पर ज्यादा ध्यान देते थे। इस समय अवधि में उन्हें अपना ज्ञान बढ़ाने और दूसरी आध्यात्मिक साधनाओं पर ध्यान देने का मौका मिलता था।

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