शिवलिंग के सामने 3 बार ताली क्यों बजाते हैं? पहली, दूसरी और तीसरी ताली में छुपे अर्थ जानिए
Shivling: शिवलिंग के सामने तीन बार ताली बजाना एक खास धार्मिक परंपरा है। पहली ताली से नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है, दूसरी ताली से भगवान शिव की कृपा मिलती है और तीसरी ताली से मनोकामनाएं पूरी होती हैं।
- Written By: सीमा कुमारी
शिवलिंग(सौ.सोशल मीडिया)
Shivling Puja Niyam: हिन्दू शास्त्रों के अनुसार शिवलिंग भगवान शिव का स्वरूप माना जाता है। शिवलिंग पर जल अर्पित करना और अभिषेक करना अत्यंत महत्वपूर्ण है। कहा जाता है कि यदि विधि-विधान से भोलेनाथ की पूजा-अर्चना की जाए, तो भगवान शिव भक्तों की सभी मनोकामनाएँ पूरी करते हैं और जीवन में सुख-शांति व समृद्धि बनी रहती है।
मंदिर का आध्यात्मिक और धार्मिक महत्व
धर्म ग्रथों में मंदिर में प्रवेश करने से लेकर आरती, अभिषेक और प्रसाद चढ़ाने तक हर काम के पीछे एक गूढ़ आध्यात्मिक और धार्मिक महत्व बताया गया है। ऐसी ही एक परंपरा है शिव मंदिर में तीन बार ताली बजाने की है जिसे धार्मिक आस्था और पौराणिक मान्यताओं से जोड़ा जाता है।
शिव मंदिर में तीन बार ताली क्यों बजाई जाती है?
ज्योतिष गुरु के अनुसार, भगवान शिव की पूजा के कुछ नियम होते हैं और मान्यता है कि उन नियमों का पालन करने के बाद ही भोलेनाथ की पूजा सम्पूर्ण मानी जाती है। शिव मंदिर में शिवजी के सामने जाकर भक्त 3 बार ताली बजाते हैं और ये कोई साधारण ताली नहीं, बल्कि भक्तों के भाव को दर्शाती है। प्रत्येक ताली के पीछे एक गहरा अर्थ छिपा हुआ है जो हर किसी को जानना चाहिए।
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पहली ताली का क्या है मतलब
शिवपुराण के अनुसार, शिवजी के मंदिर में बजाई गई पहली ताली भक्त के इस भाव को प्रकट करती है कि ‘भोलेनाथ मैं आपके चरणों में हूं। पहली ताली का अर्थ है कि भक्त ने शिवजी के समक्ष स्वंय को समर्पित कर दिया है।
दूसरी ताली का मतलब
शिवजी के मंदिर में बजाई गई दूसरी ताली का मतलब जब कोई भक्त भगवान शिव के मंदिर में जाता है तो वह कोई मनोकामना लेकर जाता है। ऐसा कहा जाता है कि, दूसरी ताली के जरिए भक्त मन ही मन अपने भाव भोलेनाथ के सामने प्रकट करता है, यह ताली निवेदन का प्रतीक मानी जाती है।
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तीसरी ताली का मतलब
भगवान शिव के मंदिर बजाई गई तीसरी ताली का मतलब है कि भक्त ने स्वंय को भगवान शिव के समक्ष समर्पित कर दिया है। इस दौरान भक्त पूजा में हुई गलती या त्रुटी के लिए क्षमा मांगता है। यह ताली इस बात का संकेत है कि भक्त अहंकार को त्यागकर पूरी श्रद्धा के साथ भोलेनाथ के चरणों में समर्पित है।
