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वट सावित्री पूजा की आ गई सही तिथि, जानिए पूजा विधि और इस व्रत की अपार महिमा

आपको बता दें, वट सावित्री का व्रत सबसे पहले राजा अश्वपति की पुत्री सावित्री ने अपने पति सत्यवान के लिए की थी। तभी से वट सावित्री व्रत महिलाएं अपने पति के मंगल कामना के लिए रखती हैं।

  • By सीमा कुमारी
Updated On: Apr 11, 2025 | 09:42 PM

वट सावित्री व्रत (सौ.सोशल मीडिया)

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Vat Savitri Vrat 2025: अखंड सौभाग्य का प्रतीक वट सावित्री का व्रत हिंदू सुहागिन महिलाओं का प्रमुख त्योहार है। यह त्योहार हर साल ज्येष्ठ माह के कृष्ण पक्ष की अमावस्या तिथि को रखा जाता है। इस बार यह व्रत 26 मई,सोमवार को रखा जाएगा। यह व्रत महिलाएं अपने पति की लंबी आयु और परिवार की खुशहाली के लिए रखती हैं।

हिन्दू शास्त्रों के अनुसार,वट सावित्री व्रत को देशभर में अलग-अलग नामों जाना जाता है जैसे कि बड़मावस, बरगदाही, वट अमावस्या आदि।

आपको बता दें, वट सावित्री का व्रत सबसे पहले राजा अश्वपति की पुत्री सावित्री ने अपने पति सत्यवान के लिए की थी। तभी से वट सावित्री व्रत महिलाएं अपने पति के मंगल कामना के लिए रखती हैं।

धार्मिक मान्यता के अनुसार, इस व्रत को पूरे विधि-विधान से करने से अखंड सौभाग्य का वरदान प्राप्त होता है। आइए जानते हैं इस साल 2025 में वट सावित्री का व्रत कब रखा जाएगा और इस व्रत का क्या महत्व है-

कब है वट सावित्री व्रत

पंचांग के अनुसार, ज्येष्ठ माह अमावस्या तिथि की शुरुआत 26 मई को दोपहर 12 बजकर 11 मिनट पर होगी। वहीं तिथि का समापन अगले दिन यानी 27 मई को सुबह 8 बजकर 31 मिनट पर होगा। ऐसे में वट सावित्री का व्रत सोमवार 26 मई को रखा जाएगा।

ऐसे करें वट सावित्री की पूजा

इस दिन महिलाएं सुबह जल्दी उठकर स्नान के बाद सास ससुर का आशीर्वाद लेकर व्रत का संकल्प लें।

इस दिन महिलाओं को लाल रंग के वस्त्र धारण करने चाहिए। साथ ही इस दिन सोलह श्रृंगार करने का भी विशेष महत्व होता है।

इसके बाद सात्विक भोजन तैयार करें।

इसे बाद वट वृक्ष के पास जाकर पंच देवता और भगवान विष्णु का आह्वान करें।

तीन कुश और तिल लेकर ब्रह्मा जी और देवी सावित्री का आह्वान करते हुए ‘ओम नमो ब्रह्मणा सह सावित्री इहागच्छ इह तिष्ठ सुप्रतिष्ठितः भव’। मंत्र का जप करें।

इसके बाद जल अक्षत, सिंदूर, तिल, फूल, माला, पान आदि सामग्री अर्पित करें।
फिर एक आम लें और उसके ऊपर से वट वृक्ष पर जल अर्पित करें। इस आम को अपने पति को प्रसाद के रूप में दें।

साथ ही कच्चे सूत के धागे को लेकर उसे 7 या 21 बार वट वृक्ष पर लपेटते हुए परिक्रमा करें। हालांकि, 108 परिक्रमा यदि आप करते हैं तो वह सर्वोत्तम माना जाता है।

व्रत का पारण काले चने खाकर करना चाहिए।

जानिए क्या है वट सावित्री व्रत का धार्मिक महत्व

हिंदू धर्म में वट सावित्री व्रत केवल एक व्रत नहीं, बल्कि आस्था, निष्ठा और अटूट प्रेम का प्रतीक माना जाता है। यह दिन विशेष रूप से विवाहित महिलाओं के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण होता है, जो अपने पति की लंबी उम्र, उत्तम स्वास्थ्य और सुखी जीवन की कामना से इस व्रत का पालन करती हैं। इस दिन वट वृक्ष (बरगद का पेड़) की पूजा का विशेष महत्व है।

शास्त्रों के अनुसार, वट वृक्ष को त्रिदेवों का वासस्थल माना गया है- तने में भगवान विष्णु, जड़ों में ब्रह्मा जी और शाखाओं में भगवान शिव का निवास होता है। यही नहीं, इस वृक्ष की लटकती हुई शाखाओं को देवी सावित्री का रूप माना गया है।

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मान्यता है कि सावित्री ने यमराज से अपने पति सत्यवान का जीवन इसी वट वृक्ष के नीचे तप करके वापस पाया था। तभी से यह वृक्ष अखंड सौभाग्य और संतान प्राप्ति का प्रतीक बन गया। जो महिलाएं पूरे विधि-विधान से व्रत रखकर वट वृक्ष की पूजा करती हैं, उन्हें सुख-समृद्धि, संतति
-सुख और पति का अखंड साथ प्राप्त होता है।

When will vat savitri fast be observed in the year 2025

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Published On: Apr 11, 2025 | 09:42 PM

Topics:  

  • Lifestyle News
  • Religion
  • Vat Savitri Vrat Pooja Vidhi

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