नई फसल से ही नहीं, लोहड़ी की अग्नि का महादेव शिव और माता सती से है ऐसा संबंध
लोहड़ी के त्यौहार से जुड़ी कई पौराणिक और लोक कथाएं हैं, जिनमें से एक कथा भगवान कृष्ण और माता सती से संबंधित है। इस कथा के माध्यम से लोहड़ी के सांस्कृतिक और आध्यात्मिक महत्व को समझा जा सकता है।
- Written By: सीमा कुमारी
माता सती से है लोहड़ी की अग्नि का संबंध, (सौ.सोशल मीडिया)
Lohri 2025: 13 जनवरी को लोहड़ी का त्योहार पूरे देशभर में मनाया जाएगा। यह पर्व विशेष रूप से पंजाब और हरियाणा में बहुत ही धूमधाम एवं हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। पंजाब और हरियाणा के अलावा, अब देश के कई हिस्सों में लोहड़ी का पर्व मनाया जाने लगा है।लोहड़ी का त्योहार सर्दियों के अंत और रवि की फसल की कटाई के प्रतीक के तौर पर हर साल मनाया जाता है।
आप भली भांति जानते है कि लोहड़ी का पर्व मकर संक्रांति से एक दिन पहले मनाया जाता है। लोहड़ी पर लकड़ियों के ढेर पर सूखे उपले रखकर आग जगा दी जाती है। फिर लोग लोहड़ी की पूजा करते है। लोग लोहड़ी की आग के चारों ओर परिक्रमा करते है। लोहड़ी की आग में मूंगफली, रेवड़ी, तिल और गुण आदि प्रसाद डाला जाता है। फिर महिलाएं लोहड़ी के लोक गीत गाती है।
इस दिन महिलाएं-पुरुष और बच्चे नाचते गाते है। यह पर्व केवल मूंगफली, गजक-रेवड़ी के बीच तक सीमित नहीं है, बल्कि इस पर्व को मनाने के पीछे एक खास वजह है। आइए जानते हैं इस बारे में-
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फसल से जुड़ा है लोहड़ी का गहरा संबंध
आपको बता दें, लोहड़ी का त्योहार फसल पकने और अच्छी खेती के प्रतीक के रूप में जाना जाता है। सूर्य के प्रकाश व अन्य प्राकृतिक तत्वों से तैयार हुई फसल के उल्लास में लोग एकजुट होकर यह पर्व मनाते हैं।
इस दिन सभी लोग इकट्ठा होकर सूर्य भगवान एवं अग्नि देव का पूजन कर उनका आभार प्रकट करते हैं। यह पर्व समाज में आपसी सद्भाव और प्रेम को भी दर्शाता है। लोहड़ी के समय फसल पक जाती है और उसे काटने का वक्त आ चुका होता है।
इस अवसर पर लोग अग्नि देव को रेवड़ी और मूंगफली अर्पित करते हैं तथा आपस में वितरित करते हैं। इसलिए यह त्योहार आपसी सरोकार और प्रेम को भी दर्शाता है।
माता सती से है लोहड़ी की अग्नि का संबंध
लोहड़ी के त्योहार से कई पौराणिक कथाओं का जुड़ाव है। लोहड़ी की इन्हीं कथाओं में से एक कथा माता सती से भी जुड़ी हुई है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, लोहड़ी की आग से माता सती का संबंध बताया जाता है।
एक बार राजा दक्ष ने महायज्ञ आयोजित किया। इसमें राजा दक्ष ने देवी देवताओं को न्योता दिया, लेकिन अपनी पुत्री सती और उनके पति भगवान शिव को नहीं बुलाया।
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सती अपने पिता के द्वारा आयोजित किए गए यज्ञ में जाने के लिए उत्सुक थी। इसके चलते भगवान शिव ने उन्हें आयोजन में जाने की इजाजत दे दी, लेकिन उस आयोजन में जाकर उन्होंने देखा कि वहां उनके पति के यज्ञ का भाग नहीं है।
इस पर उन्होंने आपत्ति की। इसके बाद राजा दक्ष ने भगवान भोलेनाथ का बहुत अपमान किया। अपने पति का अपमान माता सहन न कर सकीं। उन्होंने यज्ञ की उसी अग्नि में स्वयं को भस्म कर लिया। मान्यता है कि लोहड़ी माता सती को ही समर्पित की गई है। इसलिए लोहड़ी की अग्नि का नाता माता सती से जुड़ा है।
