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क्या त्रेतायुग में भी खेली जाती थी होली? जानिए श्रीराम और माता सीता से जुड़ी अनसुनी कथा

Holi History From Ramaya: होली का नाम आते ही अधिकतर लोग इसे द्वापर युग और भगवान श्रीकृष्ण से जोड़ते हैं, लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि इस रंगों के पर्व का गहरा संबंध त्रेतायुग और राम से भी है।

  • Written By: सिमरन सिंह
Updated On: Mar 04, 2026 | 03:14 PM

Ram and Sita playing Holi (Source. Gemini)

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Holi story of Shri Ram: होली का नाम आते ही अधिकतर लोग इसे द्वापर युग और भगवान श्रीकृष्ण से जोड़ते हैं, लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि इस रंगों के पर्व का गहरा संबंध त्रेतायुग और राम से भी माना जाता है। मान्यता है कि त्रेतायुग में भी होली मनाई जाती थी, हालांकि उसका स्वरूप आज से कुछ अलग था। यह सिर्फ रंगों का उत्सव नहीं, बल्कि सामाजिक एकता, धार्मिक आस्था और आध्यात्मिक आनंद का प्रतीक था।

अयोध्या में कैसी थी त्रेतायुग की होली?

शास्त्रों के अनुसार त्रेतायुग में अयोध्या समृद्धि और वैभव का केंद्र थी। दशरथ के शासनकाल में होली को रामराज्य की खुशहाली का प्रतीक माना जाता था। उस समय गुलाल के साथ प्राकृतिक रंगों और फूलों की वर्षा की परंपरा थी। नगर की गलियां शंख, ढोल-नगाड़ों और मृदंग की ध्वनि से गूंज उठती थीं। लोग झूमते-गाते हुए रंगों का उत्सव मनाते थे।

श्रीराम और माता सीता की पहली होली

विवाह के बाद जब सीता पहली बार अयोध्या आईं, तब पूरे नगर में भव्य उत्सव हुआ। कहा जाता है कि श्रीराम और माता सीता की पहली होली बेहद खास थी। उनके स्वागत में फूलों और इत्र की वर्षा की गई। होली के दिन राजपरिवार ने मिलकर रंगों से उत्सव मनाया। उस समय रंग हल्दी, चंदन, कुश और टेसू के फूलों से बनाए जाते थे। इस तरह यह पर्व मनोरंजन के साथ-साथ स्वास्थ्य और आयुर्वेद से भी जुड़ा हुआ था।

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वनवास काल में सादगी भरी होली

जब श्रीराम 14 वर्षों के वनवास पर गए, तब भी होली की परंपरा नहीं टूटी। चित्रकूट और पंचवटी में ऋषि-मुनियों और वनवासियों ने उनके साथ फूलों और हल्दी से होली खेली। वनवासी समाज में यह पर्व सादगी से मनाया जाता था, लेकिन श्रीराम की उपस्थिति ने इसे खास बना दिया। भजन-कीर्तन, प्रसाद और प्रेम-भाईचारे का संदेश इस पर्व का मूल भाव था।

लंका विजय के बाद भव्य उत्सव

जब श्रीराम ने लंका पर विजय प्राप्त कर माता सीता को अयोध्या वापस लाया, तब नगर में भव्य होली उत्सव मनाया गया। यह अधर्म पर धर्म की जीत का प्रतीक बन गया। राज्याभिषेक के बाद होली और अधिक उल्लास के साथ मनाई जाने लगी।

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आज भी जीवित हैं त्रेतायुग की परंपराएं

  • फूलों और प्राकृतिक रंगों से होली खेलना
  • फाग गीत और भजन-कीर्तन की परंपरा
  • गुलाल और अबीर का उपयोग
  • गुजिया, मालपुआ और ठंडाई जैसे प्रसाद

त्रेतायुग की होली हमें सिखाती है कि यह पर्व सिर्फ रंगों का नहीं, बल्कि प्रेम, आस्था और विजय का प्रतीक है।

Was holi celebrated in the treta yuga as well untold story of lord rama and mother sita

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Published On: Mar 04, 2026 | 03:14 PM

Topics:  

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