Bhishma Pitamah (Source. Pinterest)
Reason for Mahabharata: त्याग, कर्तव्य और पितृभक्ति इन तीन शब्दों के साथ अक्सर एक ही नाम जुड़ता है: भीष्म। सदियों से उनकी प्रतिज्ञा को आदर्श माना गया है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि वही प्रतिज्ञा आगे चलकर महाभारत के महायुद्ध की जड़ बनी? यह सवाल आज भी इतिहास और दर्शन के जानकारों को बेचैन करता है।
कथा के अनुसार, शांतनु के सुख के लिए भीष्म ने आजीवन ब्रह्मचर्य और राजसिंहासन त्यागने की प्रतिज्ञा ली। यह त्याग इतना महान था कि देवताओं ने भी उन्हें आशीर्वाद दिया। लेकिन एक गहरा प्रश्न यहीं से जन्म लेता है क्या हर व्यक्तिगत नैतिक निर्णय समाज के लिए भी सही होता है? यही वह मोड़ था जहाँ से महाभारत की त्रासदी ने आकार लेना शुरू किया।
राजा केवल योग्य व्यक्ति नहीं होता, बल्कि वह भी होता है जिसकी अनुपस्थिति में अयोग्य सत्ता में आ जाए। भीष्म के त्याग के बाद हस्तिनापुर की गद्दी पर ऐसे लोग आए जो परिस्थितियों से जूझते रहे धृतराष्ट्र और पांडु। एक दृष्टिहीन, दूसरा श्रापग्रस्त। क्या यह केवल संयोग था? या त्याग का राजनीतिक परिणाम? भीष्म राजसभा में प्रभावशाली थे, लेकिन अंतिम निर्णय उनके हाथ में नहीं था। यही विरोधाभास आगे चलकर विनाश का कारण बना।
महाभारत का सबसे पीड़ादायक प्रसंग द्रौपदी का चीरहरण। सभा में बैठे भीष्म सब जानते थे, पर चुप रहे। कारण था उनकी प्रतिज्ञा, उनका राजधर्म, उनकी निष्ठा। लेकिन दर्शन का कठोर प्रश्न आज भी गूंजता है:
जब अन्याय के समय तटस्थता अपनाई जाती है, तो तटस्थ व्यक्ति भी अन्याय का सहभागी बन जाता है।
भीष्म ने धर्म को नियम की तरह निभाया, जबकि श्रीकृष्ण ने धर्म को जीवित विवेक माना। यही अंतर निर्णायक साबित हुआ। यदि भीष्म स्वयं राजा होते, तो संभव है कि दुर्योधन का अहंकार शुरुआत में ही समाप्त हो जाता। पांडवों को वनवास न मिलता और सभा में अपमान की नौबत न आती। यह यदि इतिहास नहीं बदलता, लेकिन एक गहरी सीख जरूर देता है। “अत्यधिक त्याग भी हिंसा का रूप ले सकता है।”
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महाभारत इसलिए महान है क्योंकि वह दिखाता है कि अच्छे इरादे भी गलत परिणाम दे सकते हैं। भीष्म दोषी नहीं, पर पूरी तरह निर्दोष भी नहीं। उनकी प्रतिज्ञा महान थी, लेकिन समाज की दृष्टि से अधूरी। आज भी इतिहास जैसे उनसे पूछता है “क्या यह प्रतिज्ञा आवश्यक थी?” धर्म केवल निभाने का नाम नहीं है, धर्म वह है जो अन्याय को रोक सके।