Premanand Ji Maharaj (Source. Pinterest)
Premanand Ji Maharaj On True Saint: आज के समय में अक्सर यह सवाल उठता है कि संत किसे कहा जाए? क्या संत केवल भगवा वस्त्र पहनने वाला व्यक्ति होता है या इसके पीछे कोई गहरी सच्चाई छिपी है? इस पर संत प्रेमानंद जी महाराज स्पष्ट कहते हैं कि संत कोई बाहरी पहचान नहीं, बल्कि एक आंतरिक अवस्था का नाम है। हमारी आचार्य परंपरा से जो वेश मिलता है, वह निश्चित रूप से सम्मान के योग्य है, लेकिन असली संतत्व व्यक्ति के गुणों और उसके आचरण में दिखाई देता है।
महाराज जी कहते है, यदि कोई व्यक्ति संत का वेश धारण कर ले, लेकिन उसके अंदर संत के गुण न हों, तो उसे वास्तविक संत नहीं कहा जा सकता। इस संदर्भ में कहा गया है, “बिना लक्षणों वाला वेशधारी केवल प्रभु के हृदय में शूल की तरह चुभता है और भगवान के नाम को कलंकित करता है”
इसके विपरीत, यदि किसी के पास बाहरी वेश नहीं है, लेकिन उसके भीतर संत के लक्षण हैं, तो वह सच्चा संत है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण विभीषण जी हैं, जो राजसी वेश में रहते हुए भी भगवान के प्रिय बने, क्योंकि उनके अंदर भक्ति और क्षमा के गुण थे।
एक सच्चे संत की पहचान उसके व्यवहार और गुणों से होती है। कुछ मुख्य लक्षण इस प्रकार हैं:
संत वह होता है, जो मोह और अहंकार से मुक्त रहता है। उसे न सम्मान की इच्छा होती है और न अपमान का दुख। वह हर परिस्थिति में समान भाव बनाए रखता है।
संत का मन हर समय भगवान के चिंतन में डूबा रहता है। चाहे सुख हो या दुख, वह हर स्थिति को प्रभु की कृपा मानकर स्वीकार करता है।
जैसे चंदन के वृक्ष पर सांप लिपटने के बावजूद उसकी सुगंध नहीं बदलती, वैसे ही संत कुसंग में रहकर भी अपने स्वभाव को नहीं बदलते।
संत कठोर वचनों को भी शांति से सहन करते हैं और उनके मन में क्रोध नहीं आता। उनका जीवन हमेशा दूसरों के भले के लिए समर्पित होता है।
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महादेव ने माता पार्वती को समझाते हुए कहा था कि सच्चा संत वही है, जो बुराई करने वाले का भी भला करे। विभीषण जी ने भी रावण द्वारा अपमानित होने के बाद उसके कल्याण की कामना की थी। यही संत का असली स्वभाव है, जिसे अपनाने की प्रेरणा दी जाती है।
संत का असली रूप उसके कपड़ों में नहीं, बल्कि उसके आंतरिक गुणों में होता है। हमें वेश का सम्मान जरूर करना चाहिए, लेकिन एक साधक के रूप में हमारा लक्ष्य उन गुणों को अपनाना होना चाहिए, जो हमें सच्चे संत के मार्ग पर ले जाएं। संतोष और प्रभु की इच्छा में प्रसन्न रहना ही संतत्व की सर्वोच्च अवस्था है।