संतान प्राप्ति के लिए वरदान है ‘संतान सप्तमी व्रत’, विधिवत पूजा से भर जाएगी सूनी गोद!
Santan Saptami katha: संतति प्राप्ति और संतान की रक्षा के लिए संतान सप्तमी कथा का बहुत अधिक महत्व है, इसलिए इसकी पूजा में कथा का जरुर श्रवण करें, इसके बिना व्रत अधूरा माना जाता है।
- Written By: सीमा कुमारी
संतान सप्तमी की व्रत कथा (सौ.सोशल मीडिया)
Santan Saptami 2025: 30 अगस्त 2025 को संतान सप्तमी मनाई जा रही हैं। सनातन धर्म में इस व्रत का विशेष महत्व हैं। संतान सप्तमी व्रत हर साल राधा अष्टमी के एक दिन पहले और जन्माष्टमी के 14 दिन बाद मनाया जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, कहा जाता है कि, इस दिन व्रत रखने व विधि पूर्वक शिव-पार्वति की पूजा करने से निसंतान दंपतियों को संतान सुख का वरदान मिलता है।
साथ ही, उन्हें महादेव और मां पार्वती के आर्शीवाद से कार्तिकेय और श्रीगणेश जैसी तेजस्वी संतान की प्राप्ति होती है।
संतति प्राप्ति और संतान की रक्षा के लिए संतान सप्तमी कथा का बहुत अधिक महत्व है, इसलिए इसकी पूजा में कथा का जरुर श्रवण करें, इसके बिना व्रत अधूरा माना जाता है। आइए जानते हैं क्या है संतान सप्तमी व्रत कथा।
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संतान सप्तमी की व्रत कथा
पौराणिक कथा के अनुसार, जगत के पालनहार भगवान श्रीकृष्ण ने एक बार पांडु पुत्र युधिष्ठिर को भाद्र मास की शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि यानी संतान सप्तमी व्रत का महत्व बताया था। संतान सप्तमी व्रत कथा में राजा नहुष की पत्नी की भी कथा प्रसिद्ध है, इसके अनुसार एक समय अयोध्या में बड़े प्रतापी नहुष नामक राजा राज किया करते थे।
राजा की पत्नी का नाम चंद्रमुखी था जिनकी एक प्रिय सहेली थी रूपमती। एक बार रानी चंद्रमुखी अपनी सहेली के साथ सरयू तट पर स्नान करने गयीं तो वहां उन्होंने देखा कि बहुत सी महिलाएं संतान सप्तमी व्रत का पूजन कर रही थीं।
रानी अपनी सहेली के साथ वहां बैठकर संतान सप्तमी व्रत के बारे में जाना और ये तय किया कि संतान प्राप्ति के लिए वह भी इस व्रत को रखा करेंगी। ब्राह्मणी तो इस व्रत को नियमपूर्वक करती रही। लेकिन, रानी चन्द्रमुखी राजमद के कारण कभी इस व्रत को करती, कभी न करती।
कभी भूल हो रानी और उनकी सहेली देह त्याग कर परलोक चली गई। फिर इनका पशु समेत अनेक योनियों में जन्म हुआ और फिर उन्होंने अपने कर्मफल से मनुष्य शरीर प्राप्त किया।
ब्राह्मणी ने एक ब्राह्मणी के यहां कन्या रूपमती के रूप में जन्म लिया। वहीं, रानी चंद्रमुखी ईश्वरी नामक राजकन्या हुई। रूपमी को इस जन्म में भी अपने पूर्वजन्म की सभी बातें याद थी। उसने संतान सप्तमी का व्रत किया, जिससे उसे 8 संतान प्राप्त हुई। लेकिन, ईश्वरी इस जन्म में भी निःसंतान थी।
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रूपमती के पुत्रों को देखकर ईश्वरी को ईर्ष्या करने लगी,और उसने कई बार उन्हें मारने का प्रयास किया लेकिन वह असफल रही। हालांकि बाद में उसे अपने किए पर पछतावा हुआ और उसने क्षमा मांगी। ईश्वरी भी संतान सप्तमी व्रत करने लगी जिसके प्रताप से उसकी सूनी गोद भी भर गई।
