आज हरतालिका तीज पर करें इस भक्तिमय कथा का पाठ, मिलेगा अखंड सौभाग्य का वरदान
Hartalika teej vrat katha: आज हरतालिका तीज का व्रत रखा जा रहा है। इस दिन महिलाएं निर्जला व्रत रखती हैं और सौभाग्य के लिए पूजा करती हैं। हरतालिका तीज कथा सुनने से ही व्रत का पूरा फल मिलता है।
- Written By: सीमा कुमारी
जानिए क्या है हरतालिका तीज व्रत कथा (सौ.सोशल मीडिया)
Hartalika Teej Vrat Katha: आज हरतालिका तीज का पावन पर्व पूरे देशभर में मनाया जा रहा है। अगर हरतालिका तीज की बात करें तो इस त्योहार की धूम उत्तर भारत में देखने लायक होती है।
इस दौरान महिलाएं दिन भर निर्जला व्रत रहती हैं और शुभ मुहूर्त में शिव-पार्वती की रेत या बालू से बनी प्रतिमा की अराधना करती हैं। इस व्रत की पूजा वैसे तो सुबह या शाम किसी भी समय की जा सकती है। लेकिन अगर पूजा के सबसे शुभ मुहूर्त की बात करें तो इस दिन प्रदोष काल समय की पूजा का विशेष महत्व माना जाता है।
आपको बता दें सूर्यास्त के लगभग 45 मिनट पहले से लेकर सूर्यास्त के लगभग 45 मिनट बाद तक का समय प्रदोष काल माना जाता है। इसके अलावा हरतालिका तीज पर सुबह की पूजा का शुभ मुहूर्त 06:04 से 08:37 बजे तक रहेगा। ऐसे में आइए अब जानते हैं हरतालिका तीज व्रत की कथा के बारे में।
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जानिए क्या है हरतालिका तीज व्रत कथा
पौराणिक कथा के अनुसार, हरतालिका तीज की व्रत माता पार्वती जी ने भगवान शिव को अपने पति के रूप में पाने के लिए किया था। इसके लिए उन्होंने हिमालय पर गंगा के तट पर अपनी बाल्यावस्था में अधोमुखी होकर घोर तप किया। तपस्या के दौरान उन्होंने अन्न का पूरी तरह से त्याग कर दिया।
इस कठोर तपस्या की शुरुआत में वे केवल सूखे पत्ते खाकर दिन बिताने लगीं और फिर कई वर्षों तक सिर्फ हवा ग्रहण कर जीवन व्यतीत किया। माता पार्वती की यह कठिन साधना और कष्ट देखकर उनके पिता बहुत दुखी हो गए।
एक दिन महर्षि नारद भगवान विष्णु की ओर से विवाह का प्रस्ताव लेकर माता पार्वती के पिता के पास पहुंचे। माता पार्वती के पिता ने इस प्रस्ताव को सहर्ष ही स्वीकार कर लिया। पिता ने जब बेटी पार्वती को उनके विवाह की बात बतलाई तो माता को बहुत दुख हुआ और वे रोने लगीं। फिर माता पार्वती ने अपनी एक सखी के पूछने पर उसे बताया कि वे यह कठोर व्रत भगवान शिव को प्राप्त करने के लिए कर रही हैं, जबकि उनके पिता उनका विवाह श्री विष्णु से कराना चाहते हैं।
तब सहेली के सुझाव पर माता पार्वती ऐसे घने वन में चली गईं जहां दूर-दूर तक कोई आता-जाता नहीं था और वहां एक गुफा में जाकर वे भगवान शिव की आराधना में लीन हो गईं। कहते हैं मां पार्वती के इस तपस्वनी रूप को ही नवरात्रि के दौरान माता शैलपुत्री के नाम से पूजा जाता है।
फिर भाद्रपद शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को हस्त नक्षत्र में माता पार्वती ने रेत से शिवलिंग का निर्माण किया और शिव जी की स्तुति में लीन होकर रात्रि भर जागरण किया। माता के इस कठोर तप से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार कर लिया।
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कहते हैं माता पार्वती की तरह ही जो कोई महिला भाद्रपद शुक्ल पक्ष की तृतीया को हरतालिका तीज व्रत रखती है उसके पति को लंबी आयु की प्राप्ति होती है। साथ ही अविवाहित स्त्रियों द्वारा ये व्रत रखे जाने पर उन्हें मनचाहे वर की प्राप्ति का आशीर्वाद प्राप्त होता है।
