रावण ने बिना छुए सीता का हरण कैसे किया? बिना अनुमति स्त्री को स्पर्श न करने की ली थी प्रतिज्ञा
Ramayana का यह प्रसंग सदियों से लोगों के मन में एक सवाल खड़ा करता है जब रावण ने प्रतिज्ञा ली थी कि वह किसी स्त्री को बिना अनुमति स्पर्श नहीं करेगा, तो फिर वह सीता माता को लंका कैसे ले गया?
- Written By: सिमरन सिंह
Ravana's abduction of Sita (Source. Pinterest)
How Ravana Abducted Sita: रामायण का यह प्रसंग सदियों से लोगों के मन में एक सवाल खड़ा करता है जब रावण ने प्रतिज्ञा ली थी कि वह किसी स्त्री को बिना अनुमति स्पर्श नहीं करेगा, तो फिर वह सीता माता को लंका कैसे ले गया? क्या उसने अपनी प्रतिज्ञा तोड़ दी थी, या इसके पीछे कोई गूढ़ रहस्य छिपा है? आइए, इस रहस्य को विस्तार से समझते हैं।
क्या सच में रावण ने ऐसी प्रतिज्ञा ली थी?
हाँ, शास्त्रों और कथाओं के अनुसार रावण ने यह प्रण लिया था कि वह किसी भी स्त्री को उसकी इच्छा के विरुद्ध स्पर्श नहीं करेगा। इसके पीछे वेदवती का श्राप बताया जाता है। कहा जाता है कि वेदवती ने चेतावनी दी थी यदि रावण किसी स्त्री को बलपूर्वक छुएगा, तो उसका अंत निश्चित होगा। इस श्राप का भय रावण के मन में गहराई तक बैठा हुआ था।
फिर सीता हरण कैसे संभव हुआ?
धरती सहित सीता को उठाने की कथा
वाल्मीकि रामायण के अनुसार, रावण ने सीता माता को सीधे स्पर्श नहीं किया। उसने उस भूमि के हिस्से को ही उठा लिया, जिस पर सीता खड़ी थीं। अर्थात् वह धरती सहित उन्हें ले गया। इस प्रकार उसकी प्रतिज्ञा औपचारिक रूप से नहीं टूटी, क्योंकि उसने सीता के शरीर को प्रत्यक्ष रूप से स्पर्श नहीं किया।
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छाया सीता की मान्यता
कुछ पुराणों, विशेषकर आनंद रामायण और लोक परंपराओं में वर्णित है कि असली सीता अग्नि देव की शरण में सुरक्षित रखी गई थीं। रावण केवल “छाया सीता” को लंका ले गया। इस मान्यता के अनुसार, रावण ने वास्तविक सीता को छुआ ही नहीं। हालांकि यह प्रसंग वाल्मीकि रामायण में नहीं मिलता, लेकिन भक्त परंपराओं में व्यापक रूप से प्रचलित है।
छल और मायावी शक्ति का सहारा
रावण ने साधु का वेश धारण किया और मायावी रथ का उपयोग कर सीता का हरण किया। उसकी माया ने उसे अवसर तो दिया, लेकिन वह अपने श्राप और प्रतिज्ञा से भी परिचित था, इसलिए प्रत्यक्ष स्पर्श से बचने का प्रयास किया।
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रावण को श्राप का भय क्यों था?
रावण जानता था कि किसी स्त्री का अपमान या बलपूर्वक स्पर्श उसका सर्वनाश कर सकता है। वेदवती के श्राप के अनुसार उसका अंत एक स्त्री के कारण ही होना तय था। अंततः सीता हरण ही उसके विनाश का कारण बना।
प्रतिज्ञा बची, पर पाप नहीं
चाहे उसने धरती सहित सीता को उठाया हो या केवल छाया सीता को छुआ हो उसने प्रत्यक्ष स्पर्श की प्रतिज्ञा भले न तोड़ी हो, लेकिन उसका कर्म अधर्मपूर्ण था। यही अधर्म अंततः उसके पतन का कारण बना। रामायण का यह प्रसंग हमें सिखाता है कि केवल शब्दों से धर्म नहीं निभता, कर्म भी उतने ही महत्वपूर्ण होते हैं।
