रोज़ा का महत्व(सौ.सोशल मीडिया)
Ramadan Significance In Islam: इस्लाम धर्म का सबसे पवित्र महीना रमज़ान महीने की शुरुआत 19 फरवरी 2026 से हो सकती है। लेकिन अगर 18 फरवरी को चांद नहीं दिखता है तब भारत में पहला रोजा 20 फरवरी को रखा जाएगा।
रमजान इस्लामी चंद्र कैलेंडर का नौवां और सबसे पवित्र महीना माना जाता है। यह वह समय है जब पैगंबर मुहम्मद पर 610 ईस्वी में मक्का के पास स्थित हिरा गुफा में फ़रिश्ते जिब्राइल के माध्यम से पवित्र कुरान की पहली आयतों का अवतरण हुआ था। इसलिए यह महीना आध्यात्मिक जागरण, आत्म-शुद्धि और समर्पण का प्रतीक है।
इस्लामिक धर्म गुरु के अनुसार, रमजान का महीना सिर्फ एक धार्मिक परंपरा नहीं है, बल्कि यह खुद को तराशने, अपनी इच्छाओं पर काबू पाने और अपनी रूह को शुद्ध करने का एक गहरा मानवीय अनुभव है। यह महीना हमें सिखाता है कि असल इंसानियत क्या है और संयम के जरिए हम खुद को कैसे बेहतर बना सकते हैं।
अक्सर लोग रोजे को सिर्फ सुबह से शाम तक भूखे-प्यासे रहने के रूप में देखते हैं, लेकिन इसका दायरा कहीं ज्यादा बड़ा है। इसके मुख्य आधार इस प्रकार हैं:
रोजे का असल मकसद ‘तकवा’ हासिल करना है, जिसका अर्थ है- परहेजगारी या बुराइयों से बचने की शक्ति।
जब एक इंसान अपनी सबसे बुनियादी जरूरतों, जैसे भोजन और पानी को अपनी मर्जी से छोड़ देता है, तो उसके भीतर गजब का आत्मविश्वास और सेल्फ-कंट्रोल (Self Control) पैदा होता है।
यह प्रक्रिया सिखाती है कि अगर हम अपनी भूख पर काबू पा सकते हैं, तो झूठ, लालच और गुस्से जैसी सामाजिक बुराइयों को भी नियंत्रित किया जा सकता है।
रोजा केवल पेट का नहीं, बल्कि आंखों, जुबान और विचारों का भी होता है, जो इंसान को एक अनुशासित जीवन की ओर ले जाता है।
रमजान के अंतिम दस दिनों की विषम रातों में से एक को शब-ए-कद्र माना जाता है। इसे “हज़ार महीनों से बेहतर” बताया गया है। इस रात की इबादत और दुआओं का विशेष महत्व होता है।
इस महीने में मस्जिदों में विशेष नमाज़ “तरावीह” अदा की जाती है और कुरान का अधिक से अधिक पाठ किया जाता है। लोग अपने आचरण को सुधारने और आध्यात्मिक रूप से मजबूत बनने का प्रयास करते हैं।
रमजान में दान देने का विशेष महत्व है। ज़कात (अनिवार्य दान) और सदक़ा (स्वैच्छिक दान) के माध्यम से गरीबों और जरूरतमंदों की मदद की जाती है, जिससे समाज में समानता और भाईचारा बढ़ता है।
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इस्लामी इतिहास के अनुसार, इसी महीने में 624 ईस्वी में जंग-ए-बद्र हुई थी, जिसमें मुसलमानों को महत्वपूर्ण विजय मिली थी।
रमजान आत्म-अनुशासन, सहनशीलता, करुणा और ईश्वर के प्रति समर्पण को मजबूत करने का अवसर देता है। यह केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि चरित्र निर्माण और आत्मिक उन्नति का महीना है।