

Ravan Puja Ekadashi: उत्तर प्रदेश स्थित प्रयागराज को सिर्फ संगम नगरी ही नहीं, बल्कि वहां की अनोखी धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं के लिए भी जाना जाता है। दशहरे से पहले यहां होने वाली एक परंपरा देश के बाकि हिस्सों से बिल्कुल अलग और अनोखी है।
देश के ज्यादातर हिस्सों में जहां रावण के पुतले जलाकर बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक माना जाता है, वहीं प्रयागराज में दशहरे से पहले रावण की पूजा की जाती है और उसकी शोभायात्रा निकाली जाती है। इस परंपरा में रावण के विद्वान और महापंडित स्वरूप को सम्मान दिया जाता है।
प्रयागराज में पितृ पक्ष की एकादशी के दिन रावण की पूजा-अर्चना की बहुत पुरानी परंपरा रही है। ऋषि भारद्वाज आश्रम स्थित शिव मंदिर में रावण के विद्वान स्वरूप की विधि-विधान से पूजा और आरती की जाती है।
इसमें रावण को केवल लंका के राजा या रामायण में उसके किरदार के रूप में नहीं पूजा जाता है। उसके महाज्ञानी और महापंडित स्वरूप को याद किया जाता है। रावण को शास्त्रों और कई विद्याओं का गहरा ज्ञान था।
रावण की पूजा और आरती के बाद उसकी भव्य शोभायात्रा निकाली जाती है। दशानन को सजे हुए रथ पर विराजमान किया जाता है। उनके साथ उनकी पत्नी मंदोदरी और रावण के परिवार के अन्य पात्र भी शोभायात्रा का हिस्सा बनाए जाते हैं।
बैंड-बाजा और सजावट के साथ निकलने वाली इस यात्रा को देखने के लिए रास्ते में बड़ी संख्या में लोगों की भीड़ एकत्रित होती है। कई जगह शोभायात्रा का स्वागत किया जाता है। इस दौरान पूरा माहौल धार्मिक होने के साथ-साथ लोक परंपरा का रूप ले लेता है।
रावण की शोभायात्रा पहले हाथी पर निकाली जाती थी। इसके लिए हाथी को विशेष रूप से सजाया जाता था और उसके ऊपर चांदी का विशाल हौदा लगाया जाता था। इसी हौदे पर रावण के स्वरूप को विराजमान कराया जाता था। समय के साथ हाथी और घोड़ों के इस्तेमाल पर रोक लगने के बाद शोभायात्रा का स्वरूप बदला और रावण की सवारी रथ पर निकलने लगी।
प्रयागराज के कटरा क्षेत्र में रावण के पुतले का दहन नहीं किया जाता। स्थानीय परंपरा में रावण को विद्वान महापंडित के तौर पर सम्मान दिया जाता है। हालांकि प्रयागराज के कई हिस्सों में आज भी रावण दहन किया जाता है। रावण का पुतला बाद में दारागंज रामलीला कमेटी को सौंप दिया जाता है, जहां विजयादशमी के दिन उसका दहन किया जाता है।
रामायण की कथा के अनुसार, रावण का अंत उसके अहंकार और अधर्मी होने के कारण होता है, लेकिन उसके व्यक्तित्व का एक दूसरा पक्ष यह भी है कि वह विद्वान, शिवभक्त और शास्त्रों का ज्ञाता था।