

Padmanabhaswamy Temple secrets: केरल की राजधानी तिरुवनंतपुरम के ईस्ट फोर्ट इलाके में पहुंचते ही एक भव्य मंदिर आपका ध्यान खींचता है। लेकिन श्री पद्मनाभस्वामी मंदिर की खूबसूरती सिर्फ उसके ऊंचे गोपुरम में नहीं है। इस मंदिर की वास्तुकला औख आर्किटेक्चर समय से बेहद आगे की सोच को दर्शाता है। ध्यान से देखने पर यहां पत्थर, अनुपात, नक्काशी और निर्माण-कौशल ऐसी है, जो सदियों बाद भी लोगों को हैरान करती हैं।
यह संख्या अपने आप में विचित्र है। इसे साल के 365 दिन और लगभग छह अतिरिक्त घंटों से जोड़ा गया था। समय के साथ मंदिर की इस विशेषता के साथ कई कहानियां बनती चली गई। मंदिर के पूर्वी हिस्से से गर्भगृह की ओर बढ़ता विशाल गलियारा देखने लायक है। केरला टूरिज्म के अनुसार, इस कॉरिडोर में 365 और एक-चौथाई पिलर हैं, जो ग्रेनाइट पर नक्काशी करके बनाए गए हैं। ये खंभे साल के 365 दिन और अतिरिक्त समय की कहानी बताता है। इसे स्टोन कैलेंडर भी कहा जाता है।
यहां मौजूद हर खंभे को साल के किसी खास दिन या सूर्य की गति से जोड़कर बनाया गया था।
इस मंदिर में भगवान विष्णु को एक नजर में नहीं देखा जा सकता है। मंदिर के गर्भगृह की सबसे अनोखी बात शायद यही है। यहां भगवान विष्णु अनंत शेषनाग पर शयन मुद्रा में विराजमान हैं। मुख्य प्रतिमा करीब 18 फीट लंबी है और इसे तीन अलग-अलग दरवाजों से देखा जाता है। पहले दरवाजे से सिर और छाती, दूसरे से हाथों का हिस्सा और तीसरे से प्रभु के चरण के दर्शन होते हैं।
इससे न केवल धार्मिक अनुभव होता है, बल्कि मंदिर की पूरी वास्तु योजना और प्रतिमा के आकार के बीच गहरे तालमेल को भी दिखाता है।
पदमनाभस्वामी मंदिर को देखकर पहली नजर में इसकी भव्यता ही दिखाई देती है, लेकिन इसके पीछे दो अलग परंपराओं का मेल है। यह केरल और द्रविड़ियन आर्किटेक्चर के अद्भुत संगम का मिश्रण है। मंदिर के पत्थर और कांस्य के काम, भित्तिचित्र और अलग-अलग मंडप इसकी खूबसूरती को और बढ़ाते हैं। यहां स्थानीय जलवायु और निर्माण परंपरा से जुड़े तत्व भी दिखाई देते हैं और दक्षिण भारतीय मंदिर स्थापत्य की भव्यता भी।
पदमनाभस्वामी मंदिर में एक और चीज ऐसी है जिस पर नजर ठहर जाती है, वो है- ओट्टाकल मंडपम। ओट्टाकल का अर्थ है एक पत्थर से जुड़ा हुआ। यह मंडप एक सिंगल स्टोन स्लैब से बनाया गया है। आज जब बड़े-बड़े प्रोजेक्ट्स के लिए आधुनिक मशीनों का इस्तेमाल होता है, तब यह कल्पना भी नामुमकिन सी लगती है कि सदियों पहले इतने बड़े पत्थर को काटकर, तराशकर और सही जगह स्थापित करने में कितना समय और मेहनत लगा होगा।
मंदिर का कुलासेखरा मंडपम की विशेषता उसकी ध्वनि का सुनाई देना भी है। पत्थर के कुछ स्तंभों से अलग-अलग ध्वनियां भी निकलती हैं। यह निर्माण की बारीकियों को दर्शाता है। यानी जिस पत्थर को हम सिर्फ एक मजबूत निर्माण सामग्री समझते हैं, उसे शिल्पकारों ने आकार और संरचना के स्तर पर इतनी बारीकी से तराशा कि उससे अलग-अलग ध्वनियां सुनाई देती है। इसमें आवाज, रोशनी, अनुपात और दिशा का भी ख्याल रखा गया है।
मंदिर का इतिहास बहुत पुराना है, लेकिन आज जो भव्य रूप हमें दिखाई देता है, उसका एक महत्वपूर्ण हिस्सा त्रावणकोर के शासक मार्तंड वर्मा के समय से जुड़ी है। मार्तंड वर्मा ने मंदिर में बड़े पुनर्निर्माण के काम करवाए। 1750 में उन्होंने त्रावणकोर राज्य को भगवान पद्मनाभ को समर्पित किया और खुद को पदमनाभ दास यानी भगवान का सेवक माना। यह बताता है कि मंदिर की कहानी सिर्फ पत्थरों की नहीं है, इसके साथ सत्ता, राज परंपरा, भक्ति और केरल के इतिहास की भी एक लंबी कहानी है।