घर-गृहस्थी में रहते हुए आलस्य कैसे खत्म करें? प्रेमानंद जी महाराज ने बताया नाम जप और वैराग्य का सरल मंत्र
Premananda Ji Maharaj On Laziness: भागदौड़ भरी जिंदगी में आलस्य, मोबाइल की लत और मन की चंचलता हर वर्ग के लोगों को परेशान कर रही है। ऐसे में संत वचनों का मार्गदर्शन जीवन बदल सकता है।
- Written By: सिमरन सिंह
Premananda Ji Maharaj (Source. Pinterest)
Premanand Maharaj Solution To Remove Laziness: आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में आलस्य, मोबाइल की लत और मन की चंचलता हर वर्ग के लोगों को परेशान कर रही है। ऐसे में संत वचनों का मार्गदर्शन जीवन बदल सकता है। संत श्री प्रेमानंद जी महाराज के अनुसार साधना का मूल सार अत्यंत सरल है निरंतर नाम जप और सच्चा वैराग्य।
साधना का मूल मंत्र: हर समय नाम जप
प्रेमानंद महाराज जी कहते हैं कि यदि जीवन में प्रेम और शांति चाहिए, तो हर समय प्रभु का नाम स्मरण करें। सभी शास्त्रों का निचोड़ यही है कि नाम जप से ही हृदय शुद्ध होता है। लेकिन यह नाम जप स्थिर कैसे रहेगा? इसका उत्तर है सत्संग। बिना साधु संग के भजन पुष्ट नहीं होता। सत्संग वह शक्ति है जो साधक को गिरने नहीं देती और उसके मन को बार-बार प्रभु से जोड़ती है।
संसारी संग से दूरी क्यों जरूरी?
एक सच्चे उपासक के लिए यह आवश्यक है कि उसके ‘संबंध के रजिस्टर’ में केवल प्रभु का नाम हो। जहां व्यर्थ की दुनियादारी और प्रपंच की बातें हों, वहां से तुरंत हट जाना ही बुद्धिमानी है। विशेष रूप से निंदा से बचना चाहिए। किसी की बुराई करना या सुनना दोनों ही साधना को कमजोर कर देते हैं। दूसरों के दोषों का चिंतन करने से वही दोष सूक्ष्म रूप में हमारे भीतर प्रवेश कर जाते हैं। इसलिए व्यक्ति चर्चा नहीं, केवल कृष्ण चर्चा करें।
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मोबाइल और इंद्रिय संयम की सावधानी
आज मोबाइल साधना के मार्ग में सबसे बड़ा व्यवधान बन चुका है। भगवत चर्चा देखते-देखते कब मन भोग और विषयों में फंस जाए, पता ही नहीं चलता। यह वैराग्य की अग्नि को बुझा देता है।
• भोजन: स्वाद के पीछे भागने से वासनाएं बढ़ती हैं। साधारण और सात्विक भोजन मन को शांत रखता है।
• वस्त्र: दिखावे और महंगे वस्त्रों से अहंकार बढ़ता है। सादगी साधक की पहचान है।
मान-सम्मान से सावधान
यदि कोई आपका सम्मान करे, तो उसे अपने गुरु और इष्ट के चरणों में अर्पित कर दें। सम्मान स्वीकार करने से अभिमान आता है, जो भजन को ढक देता है। दूसरों को भगवान का स्वरूप मानकर सम्मान देना चाहिए, पर स्वयं विनम्र रहना ही श्रेष्ठ है। पाखंड से साधना नष्ट हो जाती है।
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त्याग का आदर्श उदाहरण
रघुनाथ दास गोस्वामी का जीवन वैराग्य की मिसाल है। उन्होंने अपार संपत्ति त्याग दी। यहां तक कि पिता द्वारा भेजे गए धन और सेवकों को भी अस्वीकार कर दिया, क्योंकि उसमें ममता के अंश थे। वे अत्यंत साधारण भोजन कर निरंतर नाम जप में लीन रहे। उनके निष्कपट त्याग से प्रसन्न होकर चैतन्य महाप्रभु ने उन्हें गले लगाया।
अंत में याद रखें सच्चा मंगल तभी है जब मुख में नाम जप हो। बिना नाम के जीवन केवल चिंता और शोक का घर है। इसलिए चलते-फिरते, खाते-पीते, हर परिस्थिति में प्रभु नाम को थामे रहें यही आलस्य मिटाने और जीवन सफल बनाने का सरल मार्ग है।
