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महंगे फूल नहीं, ये 8 अंतरात्मा के फूल चढ़ाइए, तभी पूरी होंगी मनोकामनाएँ! Shri Premanand Ji Maharaj

Premanand Ji Maharaj Discourse: संत परंपरा का स्पष्ट संदेश है: जब तक हृदय के भीतर आठ दिव्य गुणों के फूल नहीं खिलते, तब तक पूजा अधूरी है। यही वे मानसिक पुष्प हैं जो भगवान केशव को वास्तव में प्रिय हैं।

  • Written By: सिमरन सिंह
Updated On: Feb 24, 2026 | 06:29 PM

Premanand Ji Maharaj (Source. Pinterest)

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Eight Mental Flowers: आज के समय में भक्ति का मतलब कई लोग सिर्फ बाहरी दिखावे से लगाने लगे हैं महंगे वस्त्र, सजे हुए मंदिर और दुर्लभ फूल। लेकिन संत परंपरा का स्पष्ट संदेश है: जब तक हृदय के भीतर आठ दिव्य गुणों के फूल नहीं खिलते, तब तक पूजा अधूरी है। यही वे “मानसिक पुष्प” हैं जो भगवान केशव को वास्तव में प्रिय हैं और उन्हें भक्त के प्रेम से बाँध लेते हैं।

केवल बाहरी व्रत नहीं, भीतर का संकल्प जरूरी

आज उपवास भी एक औपचारिकता बनता जा रहा है। लोग व्रत के नाम पर कुट्टू की पूरी, सिंघाड़े का हलवा और तरह-तरह के पकवान खाते हैं। यदि ‘कायिक व्रत’ (शारीरिक उपवास) मन को ईश्वर में स्थिर नहीं करता, तो उसका आध्यात्मिक लाभ नहीं मिलता। सच्चा व्रत वह है जो चित्त को भगवान में लगाकर इंद्रियों को संयमित करे चौबीस घंटे में एक बार साधारण भोजन, और जो मिले उसी में संतोष।

पाँच महान मानसिक व्रत: भक्ति की नींव

आठ मानसिक फूलों को खिलाने के लिए पाँच व्रतों का पालन अनिवार्य है:

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  • अहिंसा: मन, वचन और कर्म से किसी को दुख न देना साथ ही जो हमें कष्ट दे, उसके लिए भी क्षमा भाव।
  • सत्य: परमात्मा ही सत्य हैं। उनके नाम, चरण और सत्संग में शरण लेना ही सच्चा सत्याचार है।
  • अस्तेय: जो हमारा नहीं, उसे ग्रहण न करना चाहे रास्ते में पड़ा मिला हो।
  • ब्रह्मचर्य: यह केवल त्याग नहीं, बल्कि समाज और आत्मा की रक्षा का महान संकल्प है।
  • अकल्पता: मन, वचन और कर्म में एकरूपता कोई छल, कोई छिपा स्वार्थ नहीं।

ये भी पढ़े: कागभुशुण्डि कौन थे? जानिए कौवे के रूप में जन्मे उस महाभक्त की अद्भुत कथा, जिसने समझाया मानव जीवन का असली मकसद

ये हैं वे 8 मानसिक पुष्प, जो भगवान को प्रिय हैं

  • अहिंसा: हर जीव में ईश्वर का अंश देखकर किसी को कष्ट न देना।
  • करणाग्रह: इंद्रियों को संसार से हटाकर ईश्वर में लगाना।
  • भूत दया: दूसरों के दुख को अपना समझकर सहायता करना।
  • शांति: अपमान या आलोचना में भी मन को शांत रखना।
  • सम: इंद्रियों को विषयों से हटाकर दिव्य अनुभूति में लगाना।
  • दम: मन को नियंत्रित कर भगवान के चरणों में स्थिर करना।
  • ध्यान: आराध्य के स्वरूप और गुणों का निरंतर स्मरण।
  • सत्य: जीवन के हर व्यवहार में सत्यनिष्ठा।

सच्ची पूजा दिल से शुरू होती है

भगवान धन या प्रदर्शन से नहीं, बल्कि हृदय की पवित्रता से प्रसन्न होते हैं। यदि ये आठ मानसिक पुष्प आपके भीतर खिले हैं, तो साधारण पूजा भी उन्हें प्रिय होगी। इसलिए बाहरी आडंबर से पहले भीतर के मन को सजाइए वहीं से भक्ति की असली शुरुआत होती है।

Offer these eight soul stories instead of expensive flowers and your wishes will be fulfilled shri premanand ji maharaj

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Published On: Feb 24, 2026 | 06:29 PM

Topics:  

  • Premanand Maharaj
  • Religion
  • Sanatana Dharma

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