Premanand Ji Maharaj (Source. Pinterest)
Eight Mental Flowers: आज के समय में भक्ति का मतलब कई लोग सिर्फ बाहरी दिखावे से लगाने लगे हैं महंगे वस्त्र, सजे हुए मंदिर और दुर्लभ फूल। लेकिन संत परंपरा का स्पष्ट संदेश है: जब तक हृदय के भीतर आठ दिव्य गुणों के फूल नहीं खिलते, तब तक पूजा अधूरी है। यही वे “मानसिक पुष्प” हैं जो भगवान केशव को वास्तव में प्रिय हैं और उन्हें भक्त के प्रेम से बाँध लेते हैं।
आज उपवास भी एक औपचारिकता बनता जा रहा है। लोग व्रत के नाम पर कुट्टू की पूरी, सिंघाड़े का हलवा और तरह-तरह के पकवान खाते हैं। यदि ‘कायिक व्रत’ (शारीरिक उपवास) मन को ईश्वर में स्थिर नहीं करता, तो उसका आध्यात्मिक लाभ नहीं मिलता। सच्चा व्रत वह है जो चित्त को भगवान में लगाकर इंद्रियों को संयमित करे चौबीस घंटे में एक बार साधारण भोजन, और जो मिले उसी में संतोष।
आठ मानसिक फूलों को खिलाने के लिए पाँच व्रतों का पालन अनिवार्य है:
भगवान धन या प्रदर्शन से नहीं, बल्कि हृदय की पवित्रता से प्रसन्न होते हैं। यदि ये आठ मानसिक पुष्प आपके भीतर खिले हैं, तो साधारण पूजा भी उन्हें प्रिय होगी। इसलिए बाहरी आडंबर से पहले भीतर के मन को सजाइए वहीं से भक्ति की असली शुरुआत होती है।