खुद से डरना सीख लो, जीवन अपने आप बदल जाएगा, प्रेमानंद जी महाराज की ये सीख क्यों जाननी चाहिए?
Premanand Ji Maharaj: आध्यात्मिक जीवन की राह में सबसे बड़ी बाधा बाहर की दुनिया नहीं, बल्कि मन के भीतर बैठी बेलगाम वृत्तियां होती हैं। अक्सर इंसान समाज, लोग और परिस्थितियों से डरता है।
- Written By: सिमरन सिंह
Premanand Ji Maharaj (Source. Pinterest)
इंद्रियों पर निगरानी: अकेले में भी सावधान रहना जरूरी
कई लोग यह भ्रम पाल लेते हैं कि जो गलत देखा या सोचा, वह अगर छिपकर किया जाए तो कोई नहीं जानता। लेकिन सच्चाई यह है कि ऐसा करके इंसान अपनी ही बुद्धि और आत्मा को दूषित करता है। जिसे आप पूजते हैं, वह आपके बाहरी कर्म नहीं, बल्कि आपकी आंतरिक अवस्था देखता है।
यदि चिंतन बिगड़ गया, तो कर्म बिगड़ते देर नहीं लगती और फिर पूरा जीवन उसी दिशा में बह जाता है। इसलिए मन को खाली न छोड़ें। भीतर निरंतर “राधा वल्लभ श्री हरिवंश” का स्मरण चलता रहे, ताकि इंद्रियां नियंत्रण में रहें।
विद्या और यश: साधक के दो सबसे खतरनाक शत्रु
- आध्यात्मिक मार्ग पर चलने वालों को दो सूक्ष्म शत्रुओं से विशेष सावधान रहना चाहिए विद्या और यश।
- विद्या तब बाधा बनती है, जब उससे अहंकार जन्म ले। शास्त्रों का ज्ञान अगर घमंड पैदा करे, तो वह परम सत्य तक पहुंचने से रोक देता है। इसी कारण कई संतों ने प्रार्थना की कि उनकी सांसारिक बुद्धि जड़ हो जाए और केवल प्रभु के चरणों में टिक जाए।
- यश और प्रतिष्ठा तो और भी खतरनाक हैं। सच्चे साधक के लिए दुनियावी मान-सम्मान सूअर की विष्ठा के समान होना चाहिए। जैसे ही मन प्रशंसा का भूखा होता है, साधना ईश्वर से हटकर दुनिया की ओर मुड़ जाती है और पतन निश्चित हो जाता है।
भक्ति की दृष्टि बदलते ही विपत्ति भी बन जाती है वरदान
यदि नाम-स्मरण नहीं है, तो संपत्ति भी एक दिन विपत्ति बन जाती है। लेकिन भक्ति हो, तो बड़ी से बड़ी परेशानी भी ईश्वर की शरण में ले जाने वाला आशीर्वाद बन जाती है। यह बदलाव केवल गुरु कृपा से संभव है।
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जब साधक अपनी अहंता और ममता गुरु को समर्पित कर देता है, तब वह ईश्वर का साधन बन जाता है। सच्चा समर्पण वही है, जिसमें शरीर, मन और बुद्धि पूरी तरह गुरु के हो जाएं बिना सवाल, बिना तर्क।
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वृंदावन और सत्संग की महिमा
श्री वृंदावन की रज में वह शक्ति है, जो करोड़ों वैकुंठों में भी दुर्लभ है। यहां कण-कण में “राधा” का नाम गूंजता है। रसिक संतों का संग सबसे बड़ा सौभाग्य है, क्योंकि उनकी कृपा साधक को जबरन संसार से खींचकर भगवान की ओर ले जाती है।
अंतिम संदेश
जिस तरह बल्ब, तार और बिजली होने के बावजूद हल्का-सा गैप रोशनी रोक देता है, वैसे ही भीतर थोड़ी-सी भी मैं बाकी रही, तो ईश्वर का प्रकाश प्रकट नहीं होता। पूर्ण समर्पण और नाम-स्मरण ही दिव्य आनंद की कुंजी है।
