Kagbhushundi (Source. Pinterest)
Who is Kagbhushundi: हिंदू धर्म में अनेक ऐसे दिव्य पात्र हैं, जिनकी जीवन गाथा हमें भक्ति, विनम्रता और गुरु महिमा का गहरा संदेश देती है। उन्हीं में से एक हैं कागभुशुण्डि जी एक ऐसे महान भक्त, जिनका स्वरूप कौवे जैसा बताया गया है, लेकिन जिनका ज्ञान और भक्ति देवताओं को भी चकित कर देता है।
धार्मिक साहित्य में कागभुशुण्डि को एक उच्च कोटि के रामभक्त के रूप में वर्णित किया गया है। कहा जाता है कि उन्होंने गरुड़ को रामकथा सुनाई थी। उनका मुख कौवे के समान और शेष शरीर दिव्य आभा से युक्त बताया गया है। उनका जीवन इस सत्य का प्रमाण है कि आत्मा का उत्थान किसी भी अवस्था से संभव है।
कागभुशुण्डि ने स्वयं स्वीकार किया कि उन्होंने अनेक मानव जन्म बिना भक्ति के व्यर्थ गंवा दिए। एक जन्म में वे भीषण अकाल के साक्षी बने, जिसमें उनका परिवार समाप्त हो गया। दुख और निराशा में उन्होंने ईश्वर तक को नकार दिया। मंदिर में कथा सुनने के बाद भी उनके मन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा। लेकिन एक संत के संपर्क में आकर उन्होंने दीक्षा ली। यहीं से उनके जीवन की दिशा बदली हालांकि परीक्षा अभी बाकी थी।
युवावस्था में मधुर वाणी और ज्ञान के कारण लोग उनकी प्रशंसा करने लगे। यही प्रशंसा उनके अहंकार का कारण बनी। एक दिन उन्होंने अपने गुरु का यथोचित सम्मान नहीं किया। तभी आकाशवाणी हुई “हे धूर्त! तूने अपने गुरु का अपमान किया है। जिसने अपने गुरु का सत्कार नहीं किया, समझो उसने मेरा भी सत्कार नहीं किया।” भगवान शिव के श्राप से उन्हें एक लाख वर्ष नरक में रहना पड़ा। हालांकि गुरु की प्रार्थना से उन्हें यातना नहीं मिली। यह प्रसंग सिखाता है कि गुरु का स्थान सर्वोच्च है।
अगले जन्म में उन्होंने पुनः साधना आरंभ की, लेकिन एक ऋषि से विवाद के कारण उन्हें काग योनि का श्राप मिला। विनम्रता से क्षमा मांगने पर आशीर्वाद मिला कि भक्ति स्मरण बनी रहेगी। इसी कारण वे कौवे के रूप में जन्म लेकर भी दिव्य ज्ञान से संपन्न रहे।
आखिरकार उन्हें जोगजीत नामक तत्वदर्शी संत का सान्निध्य मिला। संत ने उन्हें त्रिदेव से परे परम अक्षर पुरुष का ज्ञान दिया। श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 15 के श्लोक 16-17 के अनुसार क्षर, अक्षर और परम अक्षर पुरुष का वर्णन है। कागभुशुण्डि जी ने उसी परम अविनाशी पुरुष की भक्ति को जीवन का लक्ष्य बनाया।
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कागभुशुण्डि जी की कथा हमें चेतावनी देती है कि मानव जीवन दुर्लभ है। संत वाणी कहती है:
कबीर, मानुष जन्म दुर्लभ है, मिले न बारं-बारं।
तरवर से पत्ता टूट गिरे, बहुर ना लागे डार।।
अर्थात यह अवसर बार-बार नहीं मिलता। इसलिए अहंकार त्यागकर, सच्चे गुरु की शरण लेकर, शास्त्रसम्मत भक्ति करना ही जीवन का वास्तविक उद्देश्य है।